महर्षि थे मगन,कर रहे थे भजन।

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महर्षि थे मगन,कर रहे थे भजन।

महर्षि थे मगन,
कर रहे थे भजन।
योगी को याद प्रियतम
की आने लगी ॥ टेक ॥
हुस्न की एक कली,
तन से सजकर चली।
अपने नयनों का जादू
चलाने लगी ॥1॥

पायल खनकाई थी,
मद में इतराई थी।
अपनी बेशर्म हरकत
दिखाने लगी॥2॥

वैश्या छल से भरी,
लालच ने तंग करी।
एक-एक पग अपना
आगे बढ़ाने लगी॥3॥

देखा स्वामी ने जब,
राज समझे थे सब।
बोले बेटी क्यों खुद
को डुबाने लगी॥4॥

सुनके शर्माई थी,
गर्दन लटकाई थी।
लाज की मारी मुख
को छिपाने लगी ॥5॥

मुर्झाया मुखड़ा वो,
चाँद सा टुकड़ा वो।
कर्मठ चरणों में सर
को झुकाने लगी॥6॥