महर्षि कणाद

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Table of Contents

भारत में प्राचीन काल से ही सृष्टि, ब्रह्माण्ड और जीवन के रहस्यों पर गहन चिंतन किया जाता रहा है। ऋषियों और मनीषियों ने अपने अनुभवों और तर्कों के आधार पर विभिन्न दर्शनों की स्थापना की। भारतीय दर्शन की छह प्रमुख शाखाओं में से एक वैशेषिक दर्शन है, जिसके प्रवर्तक महर्षि कणाद माने जाते हैं। यह दर्शन मुख्य रूप से परमाणु सिद्धांत और सात पदार्थों की अवधारणा पर आधारित है।


महर्षि कणाद का जीवन परिचय

महर्षि कणाद का वास्तविक नाम ऊलूक मुनि माना जाता है। कुछ ग्रंथों में उन्हें कश्यप गोत्र में जन्मा बताया गया है। वायु पुराण के अनुसार, उनका जन्म गुजरात के प्रभास क्षेत्र (द्वारका के समीप) में हुआ था और वे सोमशर्मा के शिष्य थे।

उनका जीवन अत्यंत सरल था। वे खेतों में गिरे हुए अनाज के छोटे-छोटे कणों को चुनकर भोजन करते थे, इसलिए उन्हें ‘कणाद’ कहा जाने लगा। दूसरी मान्यता यह भी है कि उन्होंने अणु (परमाणु) के सिद्धांत की स्थापना की, इसलिए उन्हें कणाद नाम मिला। विद्वानों के अनुसार, महर्षि कणाद का समय लगभग ईसा से 400 वर्ष पूर्व का माना जाता है, हालांकि कुछ लोग उन्हें भगवान बुद्ध से भी पूर्व का मानते हैं।


वैशेषिक दर्शन का मूल आधार

महर्षि कणाद द्वारा रचित “वैशेषिक सूत्र” इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ है। बाद में प्रशस्तपाद ने इस पर “पदार्थ धर्मसंग्रह” नामक भाष्य लिखा। वैशेषिक दर्शन मुख्य रूप से परमाणुवाद (Atomic Theory) और सात पदार्थों (Categories) पर आधारित है।

१. सात पदार्थ (Categories of Reality)

वैशेषिक दर्शन के अनुसार समस्त विश्व सात पदार्थों से बना है:

  1. द्रव्य (Substance) – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, मन और आत्मा
  2. गुण (Quality) – रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श आदि कुल २४ गुण
  3. कर्म (Action) – गति, संयोग, विभाग, आकुंचन, प्रसरण
  4. सामान्य (Universality) – अनेक वस्तुओं में समानता
  5. विशेष (Particularity) – प्रत्येक पदार्थ की विशिष्टता
  6. समवाय (Inherence) – वस्तुओं के बीच अविभाज्य संबंध
  7. अभाव (Negation) – किसी वस्तु की अनुपस्थिति

परमाणु सिद्धांत (Atomic Theory)

महर्षि कणाद ने सबसे पहले परमाणुवाद का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार:

  • समस्त सृष्टि परमाणुओं (Atoms) से बनी है।
  • परमाणु अत्यंत सूक्ष्म और अविभाज्य होते हैं।
  • जब दो समान परमाणु संयोग करते हैं, तो वे द्वयणु (Molecule) बनाते हैं।
  • तीन द्वयणु मिलकर त्रयणु बनाते हैं और इस प्रकार विभिन्न पदार्थों का निर्माण होता है।
  • परमाणु अपने स्वभाव के अनुसार गति करते हैं और ईश्वर उनके संयोजन एवं निर्माण की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

वैशेषिक दर्शन और धर्म

महर्षि कणाद ने धर्म की परिभाषा इस प्रकार दी:

“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।”
(जिससे अभ्युदय [सांसारिक सुख] और निःश्रेयस [मोक्ष] प्राप्त होता है, वही धर्म है।)

इस परिभाषा में व्यक्तिगत उत्थान और आध्यात्मिक मोक्ष दोनों का समावेश किया गया है, जिससे यह दर्शन केवल भौतिक जगत तक सीमित न रहकर नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों से भी जुड़ जाता है।


  1. विज्ञान और भौतिकी पर प्रभाव – परमाणुवाद की यह अवधारणा आधुनिक भौतिकी (Physics) की परमाणु और अणु संबंधी खोजों से मिलती-जुलती है।
  2. न्याय दर्शन पर प्रभाव – वैशेषिक दर्शन ने न्याय दर्शन को तर्क और प्रमाणों के आधार पर सुदृढ़ किया।
  3. बौद्ध और जैन दर्शन से समानता – बौद्ध और जैन दर्शन में भी सूक्ष्मतम कणों की अवधारणा मिलती है, जो वैशेषिक परमाणुवाद से प्रभावित हो सकती है।

निष्कर्ष

महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन भारतीय दर्शन की सबसे प्राचीन और तर्कपूर्ण शाखाओं में से एक है। इसका आधार विज्ञान, तर्क और पदार्थों के यथार्थ विश्लेषण पर है। इसमें परमाणु सिद्धांत, सात पदार्थों का वर्गीकरण, और धर्म की व्यापक परिभाषा प्रस्तुत की गई है। वैशेषिक दर्शन ने न केवल भारतीय तात्त्विक चिंतन को प्रभावित किया, बल्कि आधुनिक विज्ञान और भौतिकी की कई अवधारणाओं से भी इसकी समानता देखी जा सकती है।

“ज्ञान के बिना आत्मा प्रकाशमान नहीं हो सकती, और ज्ञान के लिए पदार्थों की सही पहचान आवश्यक है।”

— महर्षि कणाद


मुख्य बिंदु संक्षेप में:

✅ महर्षि कणाद वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक थे।
✅ वे परमाणुवाद के सिद्धांत के जनक माने जाते हैं।
✅ वैशेषिक दर्शन के अनुसार विश्व सात पदार्थों से मिलकर बना है।
✅ परमाणु अविभाज्य और नित्य होते हैं।
✅ धर्म को अभ्युदय (सांसारिक सुख) और निःश्रेयस (मोक्ष) के रूप में परिभाषित किया गया है।


यह दर्शन आज भी विज्ञान, तर्कशास्त्र और आध्यात्मिकता में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।महर्षि कणाद और वैशेषिक दर्शन
भारत में प्राचीन काल से ही सृष्टि, ब्रह्माण्ड और जीवन के रहस्यों पर गहन चिंतन किया जाता रहा है। ऋषियों और मनीषियों ने अपने अनुभवों और तर्कों के आधार पर विभिन्न दर्शनों की स्थापना की। भारतीय दर्शन की छह प्रमुख शाखाओं में से एक वैशेषिक दर्शन है, जिसके प्रवर्तक महर्षि कणाद माने जाते हैं। यह दर्शन मुख्य रूप से परमाणु सिद्धांत और सात पदार्थों की अवधारणा पर आधारित है।

विस्तृत जीवन परिचय

परमात्मा, विश्व का निर्माण, और संचालन की प्रक्रिया के विषयों में हमारे देश में अनादि काल से चिन्तन होता रहा है। इस चिन्तन द्वारा महर्षियों को अनुभूति हुई, उसे ही ‘दर्शन’ का नाम दिया गया है। भारतीय वैदिक दर्शन के छः अंग हैं- न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदान्त। उनमें से वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद थे।

वायु पुराण के अनुसार महर्षि कणाद द्वारका के समीप प्रभासपाटन में जन्मे थे और सोमशर्मा के शिष्य थे। आपका सच्चा नाम ऊलूकमुनि था ऐसा माना जाता है। आप कश्यप गोत्र के थे। विद्वानों के अनुसार महर्षि कणाद का समय ईसा से 400 वर्ष पूर्व का माना जाता है। यद्यपि कुछ विद्वान् आप को बुद्ध के पूर्व हुए मानते हैं। आप खेत में गिरे हुए अन्न के कण (दाने) चुन-चुन कर अपनी भूख का निवारण करते थे। इस प्रकार अनाज के कण-कण के भी सदुपयोगकर्ता होने से आप ‘कणाद’ नाम से विख्यात हुए। दूसरे अर्थों में कण = अणु, अणु के सिद्धान्त के प्रवर्तक होने से आप ‘कणाद’ कहे गए।

आपका वैशेषिक सूत्र ही वैशेषिक दर्शन का मूल ग्रन्थ है। प्रशस्तपाद ने उसके ऊपर ‘पदार्थ धर्मसंग्रह’ नामक भाष्य लिखा था। वैशेषिक दर्शन का आधार परमाणुवाद है। किसी झरोखे की जाली में से आनेवाले धूप के सूर्यकिरणों में उड़ते हुए दीखनेवाले सूक्ष्मकण का साठवां भाग परमाणु कहलाता है। यह परमाणु नित्य है। अपनी विशेषता के कारण प्रत्येक पदार्थ में उसका भिन्न-भिन्न अस्तित्व होता है। इन विशेषताओं का विवेचन करने के कारण इस दर्शन को वैशेषिक दर्शन कहा गया।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार विश्व सात पदार्थों में विभक्त है- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। महर्षि कणाद के मत में विश्व का निर्माण नौ द्रव्यों से हुआ है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, मन और आत्मा।

इस ब्रह्माण्ड में 24 गुण हैं- रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श, सुख, दुःख, इच्छा द्वेष, प्रयत्न, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, बुद्धि, स्नेह, संस्कार, धर्म और अधर्म। कर्म के पांच प्रकार हैं- उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसरण और गमन। अनेक वस्तुओं में समानता के आधार से उत्पन्न एकत्व बुद्धि के आश्रय को ‘सामान्य’ कहते हैं, जैसे कि ‘मनुष्यत्व’।

इस ग्रन्थ में कणाद ऋषि ने धर्म का लक्षण इस प्रकार दर्शाया है- यतो ऽ भ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। अर्थात् जिसमें अभ्युदय (इस लोक के सुख व समृद्धि) तथा निःश्रेयस (पारमार्थिक = मोक्ष) दोनों की सिद्धि प्राप्त की जाए वह धर्म है।परमात्मा, विश्व का निर्माण, और संचालन की प्रक्रिया के विषयों में हमारे देश में अनादि काल से चिन्तन होता रहा है। इस चिन्तन द्वारा महर्षियों को अनुभूति हुई, उसे ही ‘दर्शन’ का नाम दिया गया है। भारतीय वैदिक दर्शन के छः अंग हैं- न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदान्त। उनमें से वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद थे।वायु पुराण के अनुसार महर्षि कणाद द्वारका के समीप प्रभासपाटन में जन्मे थे और सोमशर्मा के शिष्य थे। आपका सच्चा नाम ऊलूकमुनि था ऐसा माना जाता है। आप कश्यप गोत्र के थे। विद्वानों के अनुसार महर्षि कणाद का समय ईसा से 400 वर्ष पूर्व का माना जाता है। यद्यपि कुछ विद्वान् आप को बुद्ध के पूर्व हुए मानते हैं। आप खेत में गिरे हुए अन्न के कण (दाने) चुन-चुन कर अपनी भूख का निवारण करते थे। इस प्रकार अनाज के कण-कण के भी सदुपयोगकर्ता होने से आप ‘कणाद’ नाम से विख्यात हुए। दूसरे अर्थों में कण = अणु, अणु के सिद्धान्त के प्रवर्तक होने से आप ‘कणाद’ कहे गए।आपका वैशेषिक सूत्र ही वैशेषिक दर्शन का मूल ग्रन्थ है। प्रशस्तपाद ने उसके ऊपर ‘पदार्थ धर्मसंग्रह’ नामक भाष्य लिखा था। वैशेषिक दर्शन का आधार परमाणुवाद है। किसी झरोखे की जाली में से आनेवाले धूप के सूर्यकिरणों में उड़ते हुए दीखनेवाले सूक्ष्मकण का साठवां भाग परमाणु कहलाता है। यह परमाणु नित्य है। अपनी विशेषता के कारण प्रत्येक पदार्थ में उसका भिन्न-भिन्न अस्तित्व होता है। इन विशेषताओं का विवेचन करने के कारण इस दर्शन को वैशेषिक दर्शन कहा गया।वैशेषिक दर्शन के अनुसार विश्व सात पदार्थों में विभक्त है- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। महर्षि कणाद के मत में विश्व का निर्माण नौ द्रव्यों से हुआ है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, मन और आत्मा।इस ब्रह्माण्ड में 24 गुण हैं- रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श, सुख, दुःख, इच्छा द्वेष, प्रयत्न, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, बुद्धि, स्नेह, संस्कार, धर्म और अधर्म। कर्म के पांच प्रकार हैं- उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसरण और गमन। अनेक वस्तुओं में समानता के आधार से उत्पन्न एकत्व बुद्धि के आश्रय को ‘सामान्य’ कहते हैं, जैसे कि ‘मनुष्यत्व’।इस ग्रन्थ में कणाद ऋषि ने धर्म का लक्षण इस प्रकार दर्शाया है- यतो ऽ भ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। अर्थात् जिसमें अभ्युदय (इस लोक के सुख व समृद्धि) तथा निःश्रेयस (पारमार्थिक = मोक्ष) दोनों की सिद्धि प्राप्त की जाए वह धर्म है।