महिमा तेरी बड़ी है
महिमा तेरी बड़ी है,
ये अँखियाँ देखती रह गई
सगरी तेरी कृपा है,
ये सृष्टि नियमों से पल रही
बाँवरे बादल, इन्द्र-कृपा बन,
बरसाते जल चहूँ ओर
धरती को अनुप्राणित करते,
बचता ना कोई छोर
बाट जोहती, है हरियाली,
धरती हरख गई है
ये सृष्टि नियमों पे चल रही
चन्द्र ने सूर्य से, किरणें लेकर,
पूर्णिमा का पाया दान
अमावस्या के भाव समर्पित,
किरणों का किया प्रतिदान
पाकर भी किया पूर्ण समर्पण,
किरणें हवि बन गई है
ये सृष्टि नियमों पे चल रही
पूर्व दिशा से राजन् रवि भी,
लाये अग्नि-प्रसाद
परमेश्वर का अनुज खिलौना,
करता जगत् में प्रकाश
प्राण बनीं ज्योतिर्मय किरणें,
सुख की छवि बन गई है
ये सृष्टि नियमों पे चल रही
ईश्वर की इस ब्रह्मपुरी में,
लगता देवों का दरबार
वासित इसमें देव करोड़ों,
करते उचित उपकार
अनगिन ललित कलाएँ प्रभु की,
सृष्टि में घर कर गई है
ये सृष्टि नियमों पे चल रही
द्यु: से पृथ्वी, प्रेम सनी है,
एक ही तुम पालन हार
कण कण तेरे, प्रेम से परिचित,
जिसके हो तुम सूत्रधार
मानव कल्पना, कुण्ठित होके,
रह गई धरी की धरी है
ये सृष्टि नियमों पे चल रही
महिमा तेरी बड़ी है,
ये अँखियाँ देखती रह गई
सगरी तेरी कृपा है,
ये सृष्टि नियमों से पल रही
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई










