महाशय राजपाल जी का विस्तृत जीवन परिचय
(धर्म, सत्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जीवन अर्पित करने वाले महान बलिदानी)
- जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
महाशय राजपाल जी का जन्म सन् 1885 ई. में सियालकोट (अब पाकिस्तान में) एक सामान्य हिन्दू परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही अध्ययनशील, सत्यनिष्ठ और तेजस्वी बालक थे। उनका स्वभाव शांत, परंतु दृढ़ था।
उन्होंने बहुत अल्प आयु में ही धर्म, समाज और राष्ट्र के प्रति गहरी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। उनके जीवन में परिवर्तन तब आया जब उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का अध्ययन किया। यह ग्रंथ उनके जीवन का प्रेरणा-स्रोत बना।
📚 “सत्य के लिए जीना और सत्य के लिए मर जाना – यही उनका ध्येय था।”
- आर्य समाज से जुड़ाव
महाशय राजपाल जी किशोरावस्था में ही आर्य समाज से जुड़ गए थे। आर्य समाज के सिद्धांत –
मूर्तिपूजा का निषेध
स्त्री-शिक्षा का समर्थन
जातिवाद का विरोध
वेदों की ओर लौटो
सामाजिक समरसता
इन विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने आर्य समाज को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक धर्म-क्रांति का माध्यम माना।
⚔ “उन्होंने कलम को तलवार बना दिया, और साहित्य को शस्त्र।”
- प्रकाशन कार्य की शुरुआत
स्वामी दयानन्द के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने हेतु उन्होंने 1912 में “राजपाल एंड सन्ज़” नामक एक प्रकाशन संस्था की स्थापना की।
यह संस्था बहुत ही शीघ्र आर्य समाज, हिन्दू समाज एवं राष्ट्रवादियों का बौद्धिक केन्द्र बन गई। इस संस्था ने अनेक प्रेरणादायी ग्रंथों को सस्ते मूल्य पर छापा, ताकि वे जन-साधारण तक पहुँच सकें।
उनके द्वारा प्रकाशित कुछ प्रमुख ग्रंथों में शामिल हैं:
सत्यार्थ प्रकाश
वेद भाष्य
संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश
धर्म-प्रश्नोत्तर संग्रह
रंगीला रसूल (गोपनीय लेखक द्वारा)
✍ “वे मानते थे – लेखनी वह शक्ति है, जो समाज को बदल सकती है।”

- रंगीला रसूल प्रकरण – अभिव्यक्ति की लड़ाई
सन् 1924 में उन्होंने एक पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ प्रकाशित की, जो इस्लाम धर्म के पैगम्बर मुहम्मद साहब के जीवन के कुछ ऐतिहासिक पहलुओं की आलोचनात्मक विवेचना थी।
इस प्रकाशन पर बहुत विवाद हुआ। ब्रिटिश सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया, लेकिन न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त करार दिया।
यह मामला तत्कालीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक असहिष्णुता का प्रतीक बन गया।
⚖ “उन्होंने सत्य बोलने का साहस किया – चाहे परिणाम कुछ भी हो।”
- वीरगति – बलिदान की अमरगाथा
6 अप्रैल 1929 को, लाहौर में, उनके कार्यालय में एक कट्टरवादी युवक ने धोखे से जाकर चाकू से उनकी हत्या कर दी।
उनकी मृत्यु ने समस्त आर्य समाज को हिला कर रख दिया। उन्होंने अपने प्राण धर्म और विचारों की स्वतंत्रता की रक्षा में न्यौछावर कर दिए।
इस बलिदान ने उन्हें शहीदों की श्रेणी में ला खड़ा किया।
🩸 “उनकी हत्या हुई, लेकिन विचार अमर हो गए।”
- योगदान और विरासत
धार्मिक सुधार और निर्भीक प्रकाशन के माध्यम से समाज को जागरूक किया
वेद प्रचार को पुस्तक रूप में जन-जन तक पहुँचाया
सत्यार्थ प्रकाश, वैदिक साहित्य, और समाज सुधार विषयक ग्रंथों का व्यापक प्रचार
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान
आज भी उनका नाम धार्मिक निर्भीकता, विचार-स्वतंत्रता और वैदिक चेतना का प्रतीक बना हुआ है।
- श्रद्धांजलि
🕯 “महाशय राजपाल केवल एक प्रकाशक नहीं थे, वे एक विचार थे – जो हर युग में अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है।”
🕊 “उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य की राह पर चलना कठिन हो सकता है, परन्तु वही मार्ग अमरत्व की ओर ले जाता है।”










