ऋषि ने जलाई है जो दिव्य ज्योति, जहां में सदा यों ही जलती रहेगी
हजारों व लाखों को रस्ता मिलेगा, करोड़ों के जीवन बदलती रहेगी
महर्षि दयानन्द वचनामृत
- कोई कितना ही करे, परन्तु स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि होता है।
- जितने विद्याभ्यास, सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्य का संग, ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रियादि उत्तम कर्म हैं, सब तीर्थ कहाते है, क्योंकि इनको करके जीव दुःख सागर से तर जाता है।
- परमात्मा की इस सृष्टि में अभिमानी, अन्यायकारी, अविद्वान लोगों का राज्य बहुत दिन तक नहीं चलता।
- विवाह करके स्त्री पुरुष कभी किसी का अप्रियाचरण अर्थात् जिस जिस व्यवहार से एक दूसरे का कष्ट होवे सो काम कभी न करें।
- पुरुष भोजन, वस्त्र, आभूषण और प्रियवचन अदि व्यवहारों से स्त्री को सदा प्रसन्न रखें और घर के सब कृत्य उसके आधीन करें। स्त्री भी अपने पति से प्रसन्नवदन, खानपान, प्रेमभाव आदि से उसको सदा हर्षित रखे कि जिससे उत्तम संतान हो और सदा दोनों में आनन्द बढ़ता जाये।
- जब तक इस होम हवन करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था। अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाए।
- जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य, विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है, वही देश सौभाग्यवान होता है।
- जो बलवान होकर निर्बलों की रक्षा करता है वही मनुष्य कहलाता है और जो स्वार्थवश पर हानि मात्र करता है वह पशुओं का भी बड़ा भाई है।
- जिनके द्वारा शरीर और आत्मा सुसंस्कृत होने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त हो सकते हैं और संतान अत्यन्त योग्य होते हैं। इसलिए संस्कारों का करना सब मनुष्यों को अति उचित है।
- जब तक मनुष्य धार्मिक रहते हैं, तब तक राष्ट्र बढ़ता रहता है। जब दुराचारी हो जाते हैं, तब राज्य नष्ट भ्रष्ट हो जाता है।
प्रस्तुति-
आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री
अन्तर्राष्ट्रीय कथाकार, संपादक-अध्यात्म पथ * फ्लैट नं. सी-1, पूर्ति अपार्टमेण्ट (एफ ब्लॉक) विकासपुरी, नई दिल्ली-110018 (भारत)
- आर्यसमाज, बाहरी रिंग रोड, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018 (भारत)










