महर्षि चरक:

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आयुर्वेद के महान आचार्य

महर्षि चरक आयुर्वेद के महान विद्वान और चिकित्सक थे, जिन्होंने चिकित्सा विज्ञान में अमूल्य योगदान दिया। वे कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम (लगभग 200 ई.) के राजवैद्य थे और उनका मुख्य कार्य “चरक संहिता” के रूप में प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को स्थापित करने वाला प्रमुख ग्रंथ माना जाता है।


चरक का जीवन परिचय

चरक का जन्म और जीवनकाल को लेकर निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन विद्वानों का मानना है कि वे ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुए थे। वे महर्षि सुश्रुत और महर्षि पतंजलि से भी पूर्व माने जाते हैं। चरक एक कुशल चिकित्सक और महान शोधकर्ता थे, जिन्होंने आयुर्वेद को नई दिशा दी।

चरक केवल एक चिकित्सक ही नहीं, बल्कि एक दार्शनिक और वैज्ञानिक भी थे। उन्होंने न केवल रोगों के उपचार पर ध्यान दिया, बल्कि शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े गहन अध्ययन किए।


चरक संहिता आयुर्वेद का एक प्रतिष्ठित ग्रंथ है। मूल रूप से यह ग्रंथ अग्निवेश नामक वैद्य ने लिखा था, जिसे चरक ने संशोधित और परिवर्धित किया। उनके संशोधन के कारण यह ग्रंथ और अधिक प्रभावशाली और उपयोगी बन गया।

चरक संहिता के आठ विभाग

चरक संहिता को आठ भागों में विभाजित किया गया है:

  1. सूत्रस्थान – इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों का वर्णन है।
  2. निदानस्थान – विभिन्न रोगों के कारणों और उनके निदान का विवरण।
  3. विमानस्थान – औषधियों के उपयोग और प्रभावों की व्याख्या।
  4. शरीरस्थान – मानव शरीर की रचना और कार्यप्रणाली।
  5. इन्द्रियस्थान – इंद्रियों से संबंधित विकार और उनके उपचार।
  6. चिकित्सास्थान – विभिन्न रोगों के उपचार की विधियां।
  7. कल्पस्थान – औषधियों के निर्माण और विशिष्ट प्रयोग।
  8. सिद्धिस्थान – उपचार विधियों की सफलता के नियम।

चरक संहिता की विशेषताएं

  • इसमें विभिन्न प्रकार के रोगों और उनके उपचारों का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है।
  • चरक ने आहार, दिनचर्या, मानसिक स्वास्थ्य और नैतिकता को स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया।
  • इसमें औषधियों और जड़ी-बूटियों की विस्तृत जानकारी दी गई है
  • इसमें शल्यक्रिया (सर्जरी) को अधिक महत्व नहीं दिया गया, लेकिन औषधीय उपचार और चिकित्सा पद्धतियों को विस्तार से समझाया गया है।

चरक के विचार और चिकित्सा दर्शन

महर्षि चरक केवल शारीरिक रोगों पर ही ध्यान नहीं देते थे, बल्कि वे मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी समान रूप से महत्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोगों का इलाज करना नहीं, बल्कि मनुष्य को पूर्ण रूप से स्वस्थ बनाना है।

उन्होंने कहा कि एक चिकित्सक के लिए केवल ज्ञानी या विद्वान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे दयालु, नैतिक और सदाचारी भी होना चाहिए। उन्होंने चिकित्सकों के लिए एक विशेष आचार संहिता (Ethical Code) भी बनाई थी, जिसमें स्पष्ट किया गया कि चिकित्सक को लोभ, अहंकार और अन्य नकारात्मक भावनाओं से मुक्त रहना चाहिए।


चरक संहिता का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका अनुवाद अरबी, फारसी, तिब्बती और यूरोपीय भाषाओं में भी किया गया। मध्यकालीन युग में इस ग्रंथ का अध्ययन अरब और यूनानी चिकित्सकों ने भी किया। यूनानी चिकित्सा पद्धति (Greek Medicine) पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।

चरक संहिता पर कई विद्वानों ने टीकाएं लिखीं, जिनमें प्रमुख रूप से डॉ. पियरे क्यूरी, डॉ. हेनरी डेविडसन आदि शामिल हैं।


महर्षि चरक का योगदान और सम्मान

महर्षि चरक को आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान का महान सम्राट कहा जाता है। उनके योगदान के कारण आयुर्वेद चिकित्सा को संपूर्ण चिकित्सा विज्ञान में एक उच्च स्थान प्राप्त हुआ।

उनका यह विचार कि “स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है” आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। उनका नाम भारतीय चिकित्सा विज्ञान में सदैव अमर रहेगा।


महर्षि चरक केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि एक महान दार्शनिक और वैज्ञानिक थे। उनका ग्रंथ चरक संहिता आज भी आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। उनकी शिक्षाएं और सिद्धांत न केवल प्राचीन काल में, बल्कि आज भी प्रासंगिक हैं। चरक का योगदान अमूल्य है और वे भारतीय चिकित्सा परंपरा के आधार स्तंभों में से एक हैं।

विस्तृत जीवन परिचय

चरक महान् आयुर्वेदाचार्य थे। आप कुषाण सम्राट् कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। कनिष्क प्रथम का काल सन 200 का है। आप का जन्म शल्यक्रिया के जनक महर्षि सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य महर्षि पत´्जलि के भी पूर्व हुआ है। आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ है। इस ग्रन्थ का मूल पाठ वैद्य अग्निवेश ने लिखा था। चरक जी ने उसमें संशोधन कर तथा उसमें नए प्रकरण जोड़ कर उसे अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाया।

आपने आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक शोध किए तथा अनेकों संशोधन आलेख लिखे, जो बाद में चरक संहिता नाम से प्रसिद्ध हुई। चरक संहिता मूल में संस्कृत भाषा में लिखी गई है। वर्तमान में उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध होता है। आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी होने से इसे पाठ्यक्रम में भी स्थान दिया गया है।

चरक संहिता के आठ विभाग हैं। 1) सूत्रस्थान, 2) निदानस्थान, 3) विमानस्थान, 4) शरीरस्थान, 5) इन्द्रियस्थान, 6) चिकित्सास्थान, 7) कल्पस्थान एवं 8) सिद्धिस्थान। इन आठ विभागों में शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की बनावट, वनस्पतियों के गुण तथा परिचय आदि का वर्णन है।

महर्षि चरक की यह मान्यता थी कि एक चिकित्सक के लिए महज ज्ञानी या विद्वान् होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे दयालु और सदाचारी भी होना चाहिए। चिकित्सक बनने से पूर्व ली जानेवाली प्रतिज्ञाओं का उल्लेख चरक संहिता में मिलता है। वैदिक काल में इन प्रतिज्ञाओं का पालन करना सभी वैद्यों के लिए आवश्यक माना जाता था।

चरक संहिता का अनुवाद अरबी तथा युरोपीय भाषाओं में भी हो चुका है। उन-उन भाषाओं के विद्वानों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएं भी लिखी हैं। आयुर्वेद में महर्षि चरक अभूतपूर्व योगदान के लिए ही आपको आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान् सम्राट् की उपाधी से सम्मानित किया गया था।