महाराणा भगवत सिंह जी: हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज के महान सेवक
भारतवर्ष में कई राजघराने अपनी गौरवशाली परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन मेवाड़ का सूर्यवंशी राजपरिवार विशेष रूप से हिन्दू धर्म, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक बना हुआ है। इस गौरवमयी परंपरा के 75वें प्रतिनिधि थे महाराणा भगवत सिंह जी, जिनका जन्म 20 जुलाई 1921 को हुआ। उनकी जीवन यात्रा न केवल उनके परिवार की विरासत को दर्शाती है, बल्कि भारतीय समाज के लिए भी एक प्रेरणा बन गई है। ✨
शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
महाराणा भगवत सिंह जी की शिक्षा मेयो कॉलेज से शुरू हुई, जो राजकुमारों के लिए प्रसिद्ध था। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त की। वे मेधावी छात्र, ओजस्वी वक्ता और शास्त्रीय संगीत के जानकार थे। उन्होंने भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए क्रिकेट भी खेला 🏏। इसके साथ ही, उन्होंने आई.सी.एस. की प्राथमिक परीक्षा पास की और पुलिस प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनकी शिक्षा और विभिन्न क्षेत्रों में रुचि ने उन्हें बहुआयामी व्यक्तित्व का मालिक बना दिया। 📚
राजनीतिक और सामाजिक कार्य
1955 में महाराणा भगवत सिंह जी ने गद्दी संभाली। हालांकि उस समय राजतंत्र का युग समाप्त हो चुका था, फिर भी जनता का उन्हें एक राजा जैसा सम्मान प्राप्त था। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों में लगाया। महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन, शिव शक्ति पीठ और देवराजेश्वर जी आश्रम जैसे संगठन उनके द्वारा स्थापित किए गए। 🏛️💰
धर्म के प्रचारक और विश्व हिन्दू परिषद
महाराणा भगवत सिंह जी की रुचि केवल राजकाज तक सीमित नहीं थी; वे हिन्दू धर्म के उत्थान में भी बहुत सक्रिय रहे। 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद वे इसके साथ जुड़े और 1969 में परिषद के दूसरे अध्यक्ष बने। उनकी अध्यक्षता में 1984 में न्यूयॉर्क में दसवां विश्व हिन्दू सम्मेलन हुआ, जिसमें 50 देशों के 4700 प्रतिनिधि आए। 🌍🙏
हिन्दू-मुस्लिम एकता की ओर कदम
मुगल काल में कई हिन्दू परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया था, लेकिन महाराणा भगवत सिंह जी ने उन परिवारों को फिर से हिन्दू धर्म में वापस लाने के लिए प्रयास किए। उनका योगदान इस दिशा में महत्वपूर्ण था। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और अमृतसर के विशाल हिन्दू सम्मेलन में उनकी भाषण को बहुत सराहा गया। 🕊️
स्वतंत्रता संग्राम और उनका योगदान
महाराणा भगवत सिंह जी के पूर्वज महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगलों के सामने सिर नहीं झुका, और भगवत सिंह जी ने भी स्वतंत्रता संग्राम के बाद अपने पूर्वजों की धरोहर को बनाए रखा। उन्होंने कभी भी किसी राजनीतिक लाभ के लिए समझौता नहीं किया और स्वाधीनता संग्राम के महान नायकों के रूप में उनका नाम लिया गया। 🇮🇳💪
साधारण जीवन और महान कार्य
महाराणा भगवत सिंह जी ने कभी भी अपनी स्थिति या संपत्ति का घमंड नहीं किया। उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा में समर्पित किया और संस्कृत, मठ-मंदिरों की सुव्यवस्था, हिन्दू पर्वों को समाजोत्सव के रूप में मनाने और हिन्दू मतों की एकता के लिए अथक प्रयास किए। 🎶🕌
अंतिम समय और श्रद्धांजलि
महाराणा भगवत सिंह जी का निधन 3 नवम्बर 1984 को हुआ। उनके निधन से हिन्दू समाज ने एक महान नेता और प्रेरणास्त्रोत खो दिया। उनके कार्यों को हमेशा याद रखा जाएगा और उनका जीवन हिन्दू समाज के लिए एक प्रेरणा बना रहेगा। 🙏🕯️
नमन और श्रद्धांजलि
महाराणा भगवत सिंह जी के योगदान को हमेशा सम्मानित किया जाएगा। उनका जीवन उनके अद्वितीय कार्यों के कारण एक अमिट धरोहर बनकर रहेगा। आज उनके जन्मदिवस पर हम उन्हें सादर नमन और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 🏆🙏
विस्तृत जीवन परिचय
भारतवर्ष में गत 1400 वर्ष से मेवाड़ का सूर्यवंशी राजपरिवार हिन्दू धर्म, संस्कृति और सभ्यता का ध्वजवाहक बना हुआ है। 20 जुलाई 1921 को जन्मे महाराणा भगवत सिंह जी इस गौरवशाली परम्परा के 75वें प्रतिनिधि थे।
महाराणा की शिक्षा राजकुमारों की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध मेयो काॅलेज तथा फिर इंग्लैंड में हुई। वे मेधावी छात्र, ओजस्वी वक्ता और शास्त्रीय संगीत के जानकार तो थे ही, साथ ही विभिन्न खेलों और घुड़सवारी में भी सदा आगे रहते थे।
भारतीय टीम के सदस्य के रूप में उन्होंने अनेक क्रिकेट मैच खेले। उन्होंने उस समय की अत्यधिक प्रतिष्ठित आई.सी.एस. की प्राथमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर फिल्लौर में पुलिस शिक्षण का पाठ्यक्रम पूरा किया। इसके बाद वे उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त के डेरा इस्माइल खां में गाइड रेजिमेंट में भी रहे थे।
महाराणा भूपाल सिंह के निधन के बाद 1955 में वे गद्दी पर बैठे। उनकी रुचि धार्मिक व सामाजिक कामों में बहुत थी। उन्होंने लगभग 60 लाख रु. मूल्य की अपनी निजी सम्पत्ति को महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन, शिव शक्ति पीठ, देवराजेश्वर जी आश्रम न्यास, महाराणा कुंभा संगीत कला न्यास, चेतक न्यास आदि में बदल दिया।
मेधावी छात्रों के लिए उन्होंने महाराणा मेवाड़ पुरस्कार, महाराणा फतेह सिंह पुरस्कार तथा महाराणा कुंभा पुरस्कार जैसे कई पुरस्कार तथा छात्रवृत्तियों का भी प्रबंध किया। यद्यपि तब तक राजतंत्र समाप्त हो चुका था; पर जनता के मन में उनके प्रति राजा जैसा ही सम्मान था।
अपनी सम्पदा को सामाजिक कार्यों में लगाने के साथ ही महाराणा भगवत सिंह जी ने स्वयं को भी देश, धर्म और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद वे इससे जुड़ गये और 1969 में सर्वसम्मति से परिषद के दूसरे अध्यक्ष बनाये गये। अगले 15 वर्ष तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी सारी शक्ति हिन्दू धर्म के उत्थान में लगा दी। उन्होंने न केवल देश में, अपितु विदेशों में भी प्रवास कर वि.हि.प. के काम को सुदृढ़ किया। उनकी अध्यक्षता में जुलाई 1984 में न्यूयार्क में दसवां विश्व हिन्दू सम्मेलन हुआ, जिसमें 50 देशों के 4700 प्रतिनिधि आये थे।
मुगल काल में राजस्थान के अनेक क्षत्रिय कुल भयवश मुसलमान हो गये थे; पर उन्होंने अपनी कई हिन्दू परम्पराएं छोड़ी नहीं थीं। 1947 के बाद उन्हें फिर से स्वधर्म में लाने का प्रयास संघ और वि.हि.प. की ओर से हुआ। महाराणा के आशीर्वाद से इसमें सफलता भी मिली। इसी हेतु वे एक बार दिल्ली के पास धौलाना भी आये थे। यद्यपि यहां सफलता तो नहीं मिली; पर बड़ी संख्या में हिन्दू और मुसलमान क्षत्रियों ने महाराणा का भव्य स्वागत किया था।
महाराणा ने पंजाब और असम से लेकर बंगलादेश और श्रीलंका तक के हिन्दुओं के कष्ट दूर करने के प्रयास किये। खालिस्तानी वातावरण के दौर में अमृतसर के विशाल हिन्दू सम्मेलन में हिन्दू-सिख एकता पर उनके भाषण की बहुत सराहना हुई। सात करोड़ हिन्दुओं को एकसूत्र में पिरोने वाली एकात्मता यज्ञ यात्रा में आयोजन से लेकर उसके सम्पन्न होने तक वे सक्रिय रहे।
1947 के बाद अधिकांश राजे-रजवाड़ों ने कांग्रेस के साथ जाकर अनेक सुविधाएं तथा सरकारी पद पाए; पर महाराणा इससे दूर ही रहे। उनके यशस्वी पूर्वज महाराणा प्रताप ने दिल्ली के बादशाह की अधीनता स्वीकार न करने की शपथ ली थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नेहरू जी ने ऐसे दृढ़वती वीर के वंशज भगवत सिंह जी का दिल्ली के लालकिले में सार्वजनिक अभिनंदन किया।
महाराणा ने संस्कृत के उत्थान, मठ-मंदिरों की सुव्यवस्था, हिन्दू पर्वों को समाजोत्सव के रूप में मनाने, हिन्दुओं के सभी मत, पंथ एवं सम्प्रदायों के आचार्यों को एक मंच पर लाने आदि के लिए अथक प्रयत्न किये। 3 नवम्बर 1984 को उनके आकस्मिक निधन से हिन्दू समाज की अपार क्षति हुई। उनके जन्मदिवस पर उन्हें सादर नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
~ साभार : विशाल अग्रवाल










