“शीलं परं भूषणम् ।”
(शील ही परम भूषण है।)
🕉 जन्म एवं शिक्षा
महाधन शिवचन्द्र जी का जन्म 3 मार्च 1916 को दुबलगुण्डी पायेगाह (हैदराबाद रियासत) में हुआ था। उनके पूज्य पिताजी का नाम श्री अणवसप्पा जी था। बचपन से ही वे मेधावी थे। सन् 1935 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और सरकार ने उन्हें ₹165 का पुरस्कार प्रदान किया।
इसके पश्चात वे हुमनाबाद के विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हुए। किन्तु उनका हृदय केवल शिक्षण में सीमित नहीं था — उन्होंने अवकाश के समय में आर्य साहित्य का गंभीर अध्ययन करना प्रारंभ किया।
🌞 वैदिक धर्म में दीक्षा
आर्य सिद्धांतों से प्रभावित होकर उन्होंने यज्ञोपवीत धारण कर आर्यसमाज में विधिवत प्रवेश किया। उनकी कार्यकुशलता, सदाचार और वैदिक प्रतिबद्धता से प्रभावित होकर पं. नरेन्द्र जी (मंत्री, प्रतिनिधि सभा) ने उन्हें आर्योपदेशक बनने की प्रेरणा दी, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया।
🏫 प्रचारक जीवन
शिवचन्द्र जी ने हुमनाबाद, सदाशिवपेट जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में आर्यसमाज और पाठशालाओं की स्थापना की। उन्होंने समाज के भीतर वैदिक धर्म, शिक्षा और संस्कृति का प्रसार करते हुए वैचारिक नवजागरण को जन्म दिया।
✊ हैदराबाद सत्याग्रह में योगदान
हैदराबाद के धार्मिक अत्याचारों के विरुद्ध आर्यसमाज द्वारा चलाए गए धार्मिक स्वतंत्रता सत्याग्रह में शिवचन्द्र जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे शोलापुर सत्याग्रह शिविर में रियासत से सत्याग्रहियों को लाने, सूचनाएं पहुंचाने और संचालन करने का कार्य करते थे।
⚔ धर्मवेदी पर बलिदान
3 मार्च 1942 को, जब आर्यसमाज हुमनाबाद द्वारा होली के अवसर पर शोभायात्रा निकाली जा रही थी, तभी धर्मान्ध भीड़ ने आक्रमण कर दिया। इस क्रूर हमले में श्री शिवचन्द्र जी, श्री लक्ष्मणराव जी, श्री रावजी इंगड़े जी तथा श्री नरसिंह राव जी गोली का निशाना बने।
इन सभी का धर्म के प्रति निष्ठा और आर्यसमाज के प्रति समर्पण अद्वितीय था।
🌺 श्रद्धांजलि
शिवचन्द्र जी का जीवन त्याग, तपस्या, शिक्षा, प्रचार और बलिदान का अनुपम उदाहरण है। वे न केवल एक वेदप्रेमी शिक्षक थे, बल्कि एक धर्मवीर सत्याग्रही और शहीद प्रचारक भी थे।
“धर्म के लिए जीना और धर्म पर मरना — यही महापुरुषों की पहचान है।”
🌸 हम महाधन हुतात्मा शिवचन्द्र जी को शत-शत नमन करते हैं। 🌸










