महाधन धर्मवीर चौधरी ताराचन्द जी

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🏡 जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

जन्म: धावण वदी 11, संवत् 1973 वि॰ (~1916 ई॰)

स्थान: ग्राम लूम्ब, जिला मेरठ (उत्तर प्रदेश)

गोत्र: चौहान, जाट समाज

पिता: श्री चौधरी केहर सिंह

माता: श्रीमती भगवानी देवी

भाई:——————————————————————————————-

1.श्री बजित सिंह – कृषिकर्मी

2.श्री महीपाल सिंह शास्त्री – संस्कृत अध्यापक (जाट हाई स्कूल, संगरिया, बीकानेर), किरठल महाविद्यालय के स्नातक

3.सबसे छोटे – चौधरी ताराचन्द जी स्वयं

बाल्यकाल में ही पिता का साया उठ गया। उनका पालन-पोषण चाचा श्री चौ० रामचन्द्र जी के संरक्षण में हुआ, जो वैदिक धर्म के कट्टर अनुयायी और आज़ादी के आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्होंने ताराचन्द जी को धर्मनिष्ठ और देशभक्त बनने की प्रेरणा दी।


📖 शिक्षा एवं आर्य संस्कार

शिक्षा: हिंदी, उर्दू मिडिल तक .ताराचन्द जी बचपन से ही मेधावी और साहसी छात्र रहे।आर्य समाज के विचारों से गहरे रूप से प्रभावित हुए।चाचा और भाइयों के साथ-साथ वे भी आर्य सिद्धान्तों और देशसेवा की भावना से ओतप्रोत थे।


👩‍❤‍👨 विवाह

उनका विवाह सत्याग्रह से कुछ ही समय पूर्व ग्राम कटुवा, जिला मुजफ्फरनगर की श्रीमती परमेश्वरी देवी से हुआ था। विवाह के तुरंत बाद ही जब हैदराबाद में सत्याग्रह की रणध्वनि बजी, वे गृहस्थ जीवन का मोह त्यागकर धर्मयुद्ध में कूद पड़े।


हैदराबाद सत्याग्रह में भागीदारी

आर्य महाविद्यालय, किरठल से सत्याग्रह के प्रथम दल के साथ प्रस्थान किया।दलपति थे – तर्कवाचस्पति श्री चौधरी जगदेव सिंह शास्त्री सिद्धान्ती।3 अप्रैल 1936 को भाग्यनगर (हैदराबाद) के लिए प्रस्थान किया।17 अप्रैल को शोलापुर के शिविर में पहुंचे।27 अप्रैल को दल ने तुलजापुर मोर्चे पर डेरा जमाया।वहाँ उन पर मुसलमानों द्वारा हिंसक आक्रमण भी हुआ, परन्तु उन्होंने अद्भुत शान्ति और साहस से सब झेला।

🙏 वीर वचन:

जब दलपति ने पूछा – “क्या हाल है?”

ताराचन्द बोले – “हम नौजवानों की आप चिन्ता न करें। धर्म के लिए खून बहाना हमारा परम्परागत धर्म है।”


🚔 गिरफ्तारी, कारावास और विभाजन

21 अप्रैल को सत्याग्रहियों को नलदुर्ग भेजा गया।24 अप्रैल को 3-3 मास के सश्रम कठोर कारावास का दंड सुनाया गया।उन्हें औरंगाबाद जेल भेजा गया, जहाँ बाद में दलपति श्री शास्त्री जी से पुनः भेंट हुई।इसके पश्चात्सेन्ट्रल जेल, हैदराबाद में स्थानांतरित कर दिया गया।क्रूर अधिकारियों द्वारा उन पर भीषण अत्याचार हुए।अत्याचारों के कारण उनका शरीर कमजोर होता गया, लेकिन मनोबल अडिग रहा।


🕯 बलिदान

अत्यधिक पीड़ा और जेल के अमानवीय व्यवहार से ताराचन्द जी की अवस्था अत्यंत शिथिल हो गई।18 अगस्त 1936 को उन्हें जेल से मुक्त किया गया, परंतु“शरीर अब शेष नहीं था – केवल एक तपस्वी आत्मा थी जो धर्म के लिए झुलसी हुई थी।”नागपुर पहुँचते-पहुँचते वे अति निर्बल हो गये।डा० परांजपे द्वारा अस्पताल में भरती कर उपचार कराया गया।किंतु उस धर्मयोद्धा की आत्मा परमात्मा से मिलन के लिए उड़ चली।


🕊 विरासत और प्रेरणा

ताराचन्द जी ने धर्म के लिए बलिदान, गृहस्थ के मोह से विरक्ति और अद्भुत संयम का आदर्श प्रस्तुत किया।वे केवल आर्य समाज के नहीं, सम्पूर्ण भारतवर्ष के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।उनकी अंतिम वाणी में धर्म की आस्था और बलिदान का स्वाभिमान गूंजता है।धर्म से मुँह नहीं मोड़ूंगा, भले ही जान दे दूं।”


🌺 श्रद्धांजलि

चौधरी ताराचन्द जी का बलिदान आर्य इतिहास के उन अनमोल पृष्ठों में लिखा गया है, जो युगों तक पढ़े जाएंगे।
उनकी स्मृति हमें सिखाती है –एक सच्चा आर्य वह है जो धर्म के लिए जीवन को उत्सर्ग कर दे।”