“जुल्म की टहनी कभी फलती नहीं, नाव कागज की कभी चलती नहीं।”
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
पूर्व नाम: नागप्पा
पिता का नाम: श्री सायवण्णा जी
जन्म वर्ष: शाके १८३६ (सन् १९१४ ई.)
जन्म स्थान: कल्याणी ग्राम, निजाम राज्य
कल्याणी, जो एक समय चालुक्यवंशी राजाओं की राजधानी थी, अब एक मुसलमान नवाब की जागीर बन चुकी थी। वहाँ हिन्दू समाज को अनेक प्रकार के अपमान और अत्याचार सहने पड़ते थे।
धर्म जागरण और संगठन का कार्य
धर्मप्रकाश जी का व्यक्तित्व तेजस्वी और ओजस्वी था। आर्यसमाज से जुड़ने के पश्चात उन्होंने हिन्दू नवयुवकों को एकत्र कर उन्हें आत्मरक्षा की शिक्षा देना प्रारंभ किया। वे अत्याचारों के विरुद्ध डटकर खड़े रहते और निर्भीकता से अत्याचारियों को ललकारते।
उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में महर्षि दयानन्द के इस सिद्धांत को आत्मसात कर लिया था —
“… जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे…”
विरोध, षड्यंत्र और बलिदान
मुसलमान कट्टरपंथियों और खाकसार-पार्टी को धर्मप्रकाश जी का साहस और संगठन रास नहीं आया। वे बार-बार आक्रमण के शिकार हुए, पर हर बार अपनी वीरता से बचे।
अन्ततः ज्येष्ठ अमावस्या, शाके १८६० (२७ जून १९३८ ई.) को रात्रि के आठ बजे जब वे आर्यसमाज के सत्संग से लौट रहे थे, उन्हें एक गली में घेरकर बेरहमी से बरछी और भाले से बध कर दिया गया।
न्याय का अपमान
घातकों पर मुकदमा चला, साक्ष्य भी प्रस्तुत हुए, परंतु न्यायालय ने उन्हें निर्दोष बता कर मुक्त कर दिया। यह वही समय था जब निजाम राज्य में हिन्दुओं के विरुद्ध अन्याय, अत्याचार और धार्मिक दमन अपनी पराकाष्ठा पर था।
प्रेरणापुंज धर्मवीर
महाधन धर्मप्रकाश जी का जीवन हम सभी के लिए सत्य, साहस और समर्पण की गाथा है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि धर्म, संगठन और आत्मरक्षा के सिद्धांत के प्रतीक हैं।
“जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, वही सच्चा धर्मवीर होता है।”










