महाधन ब्रह्मचारी रामनाथ

0
12

महाधन ब्रह्मचारी रामनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशी संवत् १९७३ वि० (तारीख १६ जून सन् १९१७ ई०) में हुआ था। उनका जन्म स्थान अहमदाबाद के समीप श्रसारवा नाम का कस्बा है। उनके पिता का नाम मोतीभाई रणछोड़ भाई तथा माता का नाम श्री मणि बहन है। ब्रह्मचारी रामनाथ के आठ भाई बहन और थे। यद्यपि गुजरात सनातन धर्म का गढ़ है, आर्यसमाज का प्रचार प्रायः नहीं के बराबर है तथापि ब्रह्मचारी के पिता बहुत सुधारक विचारों के तथा विद्याप्रेमी थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका पुत्र विद्वान्, श्रार्य संस्कृति का प्रेमी और धर्म का सेवक बने। इसी विचार को लेकर उन्होंने पुत्र राम को सूपा गुरुकुल (नवसारी) में प्रविष्ट कराया।

सन् १९३५ की घटना है। ब्रह्मचारी रामनाथ उन दिनों गुरुकुल की आठवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। गर्मी की छुट्टियां हुईं और वह घर आया। उन्हीं दिनों गुजरात के बोरसद तालुके में प्लेग फैला हुआ था। जिसने परोपकार का पाठ पढ़ा हुआ था, महर्षि दयानन्द का बलिदान जिसके हृदय में सूर्य की भांति प्रकाश कर रहा था, विश्व के दुःख को दूर करने की उमंगें जिसके तरुण हृदय में उमड़ा करती थीं, वह गुरुकुल का ब्रह्मचारी राम घर में बैठ न सका और बहन के साथ निर्भीक होकर सेवा क्षेत्र में जा पहुँचा। वहां पहुंचकर पीड़ित भाई बहनों की यथाशक्ति सेवा की। यह घटना उन बलिदान की भावनाओं की प्रतीक है जो उसके हृदय में थीं।

गुरुकुल सूपा में रहकर उसने दस वर्ष तक विद्याभ्यास किया। तदनन्तर अधिकारी परीक्षा पास करके उच्चशिक्षा की प्राप्ति के लिए वह गुरुकुल विश्वविद्यालय काँगड़ी (हरिद्वार) में प्रविष्ट हुआ।

हैदराबाद (निजाम) का आर्य सत्याग्रह इतिहास की अभूतपूर्व वस्तु है। जब महात्मा श्री नारायण स्वामी जी महाराज सत्याग्रह के प्रथम सर्वाधिकारी चुने गये तब उन्होंने गुरुकुल काँगड़ी के ब्रह्मचारियों को सत्याग्रह करने को बुलाया। ब्रह्मचारी रामनाथ ने सत्याग्रह में जाने की अनुमति पाने के लिये घर पर पत्र लिखा। माता का मोह तो वैसे ही प्रबल होता है — पर जहां धर्म की रक्षा के लिये जान की बाजी लगाना हो वहां तो कोई बिरली माता ही प्राणत्याग करने की अनुमति दे सकती है।

ब्रह्मचारी ने बहुतेरा जोर लगाया कि माता-पिता अनुमति दे दें, पर उसे अनुमति न मिली। कितने ऐसे माता-पिता होंगे जो कि अपने जिगर के टुकड़े को, हृदय के लाल को, जो उनकी आशाओं का केन्द्र हो, होनहार हो — अनुमति देंगे कि पुत्र! जा, धर्म की वेदी पर अपना बलिदान कर दे।

अनुमति मिले वा न मिले, रामनाथ अपना कर्त्तव्य भूला न था। वीर हकीकत का जीवन उसके सामने था। सत्यार्थ प्रकाश में उसने पढ़ा था कि दुःख का पापाचरण और सुख का धर्माचरण मूल कारण है। परलोक में न माता-पिता, न पुत्र, न स्त्री सहायता कर सकते हैं, किन्तु एक धर्म ही सहायक होता है।
“न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः”।

उसे यह भी ज्ञात था कि शास्त्र का आदेश है कि माता-पिता की धर्मयुक्त आज्ञाएं मानो। अतएव उसने यही निश्चय किया कि इस अनमोल अवसर को हाथ से न जाने देगा। जीवन में इस प्रकार के सौभाग्य बार-बार नहीं मिला करते। धर्म तो उसकी मनचाही कामना पूर्ण करने के लिये सौभाग्य स्वरूप स्वयं द्वार पर आया है। यह सत्याग्रह के लिये तैयार हो गया और अपने दल के साथ चल पड़ा।

श्री सत्यदेव जी विद्यालङ्कार ने अपने “आर्य सत्याग्रह” में लिखा है —
“नारायण स्वामी जी महाराज को ३१ जनवरी को प्रत्यक्ष सत्याग्रह का अवसर न मिलने पर भी अजमेर के स्वामी भास्करा-नन्द जी और गुरुकुल काँगड़ी के ब्रह्मचारी उस दिन सत्याग्रह करने में नहीं चूके। इन्हीं की देखा देखी सम्भवतः अन्य लेखकों ने भी लिखा है कि गुरुकुल काँगड़ी के ब्रह्मचारियों को महात्मा नारायण स्वामी जी के साथ सत्याग्रह करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। परन्तु यह बात नितान्त असत्य है। न जाने इन्हें यह सामग्री कहाँ से लिखने को मिल गई? गुरुकुल को तार दिया गया कि समय पर पहुंचो परन्तु जब महात्मा नारायण स्वामी जी ने पहली बार सत्याग्रह किया तब भी और जब दूसरी बार किया तब भी ये नहीं पहुँचे। महात्मा नारायण स्वामी जी के साथ दूसरे आदमियों ने सत्याग्रह किया। गुरुकुल का जत्था देर से पहुंचा और उन्होंने सीधे हैदराबाद में जाकर सत्याग्रह किया।”

सत्याग्रह करने पर पुलिस ने इनको गिरफ्तार किया। इन्हें सजाएं हुईं। बन्दी जीवन के दिन इन लोगों ने हैदराबाद और बरङ्गल के कारागारों में बिताये। जेलों में जो यन्त्रणाएं दी जाती हैं, जो मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, वे सब इन लोगों ने सहन कीं। फिर यह जेल तो रिसायती था। सवाल मजहब का था। फिर तो जो कुछ हुआ, सो थोड़ा। ब्रह्मचारी रामनाथ ने भी क्या-क्या कष्ट नहीं उठाया। मल-मूत्र इसने उठाया। कमरे में बन्द करके इसको पीटा गया। गालियां सुनने के अनम्यस्त इस युवक ने गन्दी गालियां भी सहन कीं और अनेकों प्रकार के दुःख प्रसन्नतापूर्वक सह गया।

हृदय में परमपिता परमात्मा का विश्वास था। धर्म पर मर मिटने का उत्साह था। साथियों का सहारा था। इस प्रकार यातना-नल में अपने को दग्ध करते हुए कारा के छः मास बिता दिये।

अन्ततः परमेश्वर की असीम कृपा से आर्यों की विजय हुई। सम्पूर्ण आर्य-जगत् में खुशी की एक लहर दौड़ गई। सभी कैदी मुक्त कर दिये गये। ब्रह्मचारी रामनाथ भी साथ ही मुक्त हुए। जेल में ही इन्हें विषमज्वर ने घेर लिया था। जेल से छूटकर वे घर आये। वहाँ दो सप्ताह रुग्णशय्या पर पड़े रहे। अन्ततः इस ज्वर ने इनका प्राणहरण कर लिया।

भावनाशील धर्मप्रेमी इस नवयुवक का 8 सितम्बर 1939 के दिन देहावसान हो गया। हृदय में विजय की खुशी लिये, आर्यों को विजय पताका फहराने के लिये — धर्म पर बलिदान होने वाले शहीद रामनाथ ने परलोक को प्रयाण किया।