दुनियाँ की हालत
(तर्ज-मयखाना तो छूट गया दर छूटे न मयख़ाने का)
क्या कहूँ दुनियाँ की हालत लग गई बीमारी है।
उड़ चली जग से शराफ़त बढ़ गई मक्कारी है।
क्या कहूँ दुनियाँ की हाल……….
१. पनप रही है चोर बाज़ारी धर्म का कोई काम नहीं है।
दानवता ही दानवता है मानवता का नाम नहीं है।
बे असर सब हो गए सुर असुरों की सरदारी है।
क्या कहूँ दुनियाँ की हालत…………
२. बहुत मिलेंगे छलबल वाले मुश्किल से कोई नेक मिलेगा।
मन वाणी और कर्म का पूरा लाखों में कोई एक मिलेगा।
करते हैं मन्दिर में पूजा और मिलावट जारी है।
क्या कहूँ दुनियाँ की हालत…………
३. ऊपर से हँस हँस मिलते हैं दिल में किसी के प्रीत नहीं है।
मतलब के सब संगी साथी बिन मतलब कोई मीत नहीं है।
है ‘पथिक’ मन में कपट और बातों में हितकारी है।
क्या कहूँ दुनियाँ की हालत………..










