क्रियावान् ईश्वर, सुकृत कर्म करते

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क्रियावान् ईश्वर, सुकृत कर्म करते

क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते
नियम हैं अटल,
ना कभी वो बदलते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

कहीं पर नदी नाले
कहीं जल का सागर
कहीं पर है पर्वत
कहीं बालू सागर
जो प्रभु की ही चतुराई
दर्शाते रहते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

नदी वायु सागर
उमंगों में बहते
अग्नि सूर्य चन्द्र
तो दान ही करते
सभी देव प्रभु के
क्रियावान् रहते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

घटा ना आकाश
घटा ना प्रकाश
यह सूर्य उठाता है
सागर से भाप
यह सागर भी अपनी
परिधि में ही रहते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

यह सृष्टि है कितनी
विशेष विभिन्न
सूरज तो प्रकाशित
पृथ्वी ज्योतिहीन
यह प्रज्ञा क्रिया
प्रभु की शोभा को वरते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

सभी जीव-संख्या
तो निशदिन है बढ़ती
यह पृथ्वी तो सबका ही
पालन है करती
सभी जीव माता की
गोद में पलते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

कभी भी थका देह
क्रिया छोड़ देता
प्रलय भी जगत् को
निकलता ही रहता
प्रभु तो सदा ही
क्रियावान् रहते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते

अकर्मण्यता ना है
ईश को प्यारी
क्रियावान् ही बनते
जग-हितकारी
क्रियावान् साधक ही
ईश्वर को वरते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते
नियम हैं अटल,
ना कभी वो बदलते
क्रियावान् ईश्वर
सुकृत कर्म करते