कवियों का गीत

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परि कोश मधुश्चतव्यये वारै अर्षति। अ॒भि वाणी ऋषीणां सुप्त नूषत ॥

साम. ५७७ ऋ. ६. १०३. ३

तर्जः प्रिय सखी ऐवीड़िनी प्रणयीनी, अरियुमो,

(राग-तिलक कामोद)

अनुस्मृति अनुकृति अनुशयी अनुनयी
बन जाये आत्मा, भक्ति रस से करें तेरी स्तुति (2)
तुझे पाने के उद्देश्य से प्रभु सत्यकर्म सदा करें
भगवन्, हर समय गाये तव कीर्ति

सा ऽ नीसा नीसा रेगमप धपमगरे रे ग म प नी प रे म ऽ
नीपरे मग सारेनी सा

अब हमारे श्वास श्वास, मन के हैं मनके
मनोमय विज्ञानमय बनें कोष प्रपन्न से
कृपा हुई अनुभूत तेरी हुआ मैं तुझमें आसन्न ।
पाया आत्म प्रसाद तुझसे हुआ मैं प्रेम-प्रगम
आनन्दमय कोष तक, पहुँचा दिया भगवन्॥
॥अनुस्मृति॥

अब तुम्हारी कृपा दे रही है जीवन प्रतिक्षण
आ रहा है अब तेरी स्तुतियों में भी आनन्द
इन्द्रियाँ ऋषि बन गई हैं, पल्लवित अङ्ग अङ्ग
कर रही हैं सत्कार जगा प्रेम-प्रसंग
वाणी रूप बना हर इक अङ्ग, गाते गीत भजन
॥अनुस्मृति॥

वास्तविक रस पा लिया सार्थक हुआ जीवन
सप्त ऋषियों को दिया प्रभु ने पूर्णानन्द
तेरी संजीवनी से पाया सच्चा संजीवन

आत्मदर्शी मेरी इन्द्रियाँ हो गईं पावन
अब वो हैं परमात्मदर्शी जिसमें परमानन्द
॥ अनुस्मृति ॥

मस्त होके इन्द्रियाँ हो गई हैं गानमय
मूक वाणी में जगा प्रभु तेरा प्रेम-प्रणय
जड़ परमाणु पिण्ड भी हो तो गये चेतन
आचरण करके आलौकिक हो गये प्रतिपन्न
हो गया जीवन, लम्बी सन्ध्या का कीर्तन ॥
॥अनुस्मृति ॥

(संजीवनी) अमृत। (संजीवन) साथ साथ रहना। (अनुस्मृति) सब ओर से ध्यान हटा केवल
एकाकी में ध्यान। (अनुकृति) अनुरूपता। (अनुनयी) विनम्रता, शालीनता। (प्रपन्न)
याचक, शरणागत, प्रार्थी। (अनुशयी) पश्चाताप करने वाली। (प्रतिपन्न) पूर्ण जाना हुआ।
(मनके) माला के दाने। (प्रगम) प्रेम प्रगत्ति का प्रथम पग। (पंचकोष) अन्नमय, प्राणमय,
मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। (आसन्न) निकट, उपागत। (प्रसंग) घनिष्ठ संबंध।
(प्रणय) प्रीतियुक्त प्रार्थना।