करो दूर पापों से प्रभुजी! जीवन पाप में ढल ना जाए तू ही सहाय

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करो दूर पापों से प्रभुजी! जीवन पाप में ढल ना जाए तू ही सहाय

तर्ज : कहीं दूर जब दिल ढल जाए,

करो दूर पापों से प्रभुजी! जीवन पाप में ढल ना जाए तू ही सहाय

पाप पुण्य का भेद समझकर भक्त जो तेरी शरण में आए तू ही सहाय

पापों के पथ पर जो भी जाए नदी प्रवाह सम बहता जाए

कोई किनारा ढूँढ़ ना पाए, दुविधा में तब तुझे बुलाए तू ही सहाय

पाप की वृत्ति जैसी मन में वैसा ही पापी बन जाए

भटक भटक जब मन भरमाए फिर जबसही दिशा में जाए तू ही सहाय

पापाचार ही पतित बनाए पाप बढ़े भय बढ़ता जाए

चुपके छुपके कर्म कराए मन जब पश्ताताप में जाए तू ही सहाय

पाप पुण्य का है दोराहा जहाँ से मार्ग अलग हो जाएँ

या आत्मा पथ पाप के जाए और जो पुण्य के पथ पे जाए तू ही सहाय

पापी यदि साधक बन जाए पुण्य का दृढ़ संकल्प जगाए

पाप ज्यूं आए वैसे ही जाए, प्रतिपक्ष का भाव जो आए तू ही सहाय

आत्मा में जब पुण्य समाए क्या कारण फिर पाप में जाए

अंगारों से जलते जलते योगधर्म को जब अपनाए तू ही सहाय