कर श्रवण वेद का वेद के पाठियो
अब तुम्हारे हवाले धरम साथियो ॥
जो समय है मिला व्यर्थ खोना नहीं
अन्त आया तो कुछ तुझसे होना नहीं
इसलिए ज्ञान के बीज तुम बाँटियो ॥ अब तुम्हारे..
आज संसार में सुख व चैन नहीं
आज मानव को मानव से प्रेम नहीं
खुद जगो, फिर कहो सबसे तुम जागियो । अब तुम्हारे ।
आत्मा मन व बुद्धि की कलियाँ खिलीं
ऐसी कलियाँ तो पशुओं में खिलती नहीं
अपना वेदानुसार जीवन आँकियो । अब तुम्हारे ॥
रात अज्ञान की कितनी संगीन थी
लाए सुबह ऋषि कैसी रंगीन थी
लालिमा जो सुबह की उसे बाँटियो । अब तुम्हारे !!
महर्षि दयानन्द ने वेद पढ़े
वेद का ज्ञान लेके उस पे चले
वेद के पथ चलो सन्त के नातियो ॥ अब तुम्हारे ॥
मन के रोगों की औषध तो वेदों में है
और सुख शान्ति आनन्द तो वेदों में है
वेद सूर्य है उसकी बनो बातियो ॥ अव तुम्हारे ॥
वेद में ईश की वैसी सूरत नहीं
जैसा तुम सोचते हो वो मूरत नहीं
झाँकी प्रभु की हृदय में, हृदय झाँकियो ॥ अब तुम्हारे !!
वेद में सत्य विद्या है ब्रह्मज्ञान की
है विधि इसमें आत्मा के समिधान की
मिल के वेदों के राग गाओ रागियो ॥ अब तुम्हारे ॥
कैसी सुन्दर है वेदों की वाणी ‘ललित’
सृष्टि के आदि से है ये ईश्वर-प्रमित
वेद पे सच्ची निष्ठा श्रद्धा राखियो । अब तुम्हारे ॥
प्रमाणित, प्रदर्शित, ज्ञात (श्रद्धा) पूज्य भाव आदर, स्पृहा (समिधान) प्रदीप्त (प्रमित) निश्चित
तर्ज :कर चले हम फिदा जानेमन साथियो










