अग्ने क्दा त आनुपरमुवद्द्वस्य चेतनम् ।
अा ही त्वां जगृचिरे मर्ता सो विक्ष्वीय॑म् ॥ ऋः ४.७.२.
तर्जः मालवून टाकदीप
हे जगत के ज्योतिपुञ्ज करो प्रभास से अङ्ग अङ्ग
हे चैतन्य! हे प्रबोध दो तुम्हारा अमिट संग॥
॥हे जगत के॥
साधना में बीते युग फिर भी ना बने प्रबुद्ध (2)
रिक्त वाणी पूर्ववत् है, होगी कब कृपा अत्यन्त ॥
॥हे जगत के॥
दया दृष्टि पाने, तुम्हें हृदय में किया ग्रहण (2)
निष्ठा है सम्पूर्ण परिपक्व होवेंगे सम्बन्ध॥
॥हे जगत के॥
पूजनीय हो प्रजा के महिमागान के सुयोग्य (2)
मन्द्र भाव भीने हृदय, लाए हैं, हे अनन्त !
॥हे जगत के॥
दे दो दिव्य ज्ञान, स्फूर्ति जागृति जयद ज्वलंत (2)
चेतना की दो चिन्गारी, हे प्रबुद्ध, हे चैतन्य !॥
॥हे जगत के ॥
सहृदयता सौमनस्य की बहा दो धन्य ग्रस्त
वासनायें हरो, हर लो सारे छल धार (2) प्रपञ्च ॥
॥हे जगत के॥
दिव्य चेतना से हो अनुप्राणित मनुष्य (2)
जिससे हम बनें महान दिव्य दानी देव संत॥
॥हे जगत के॥
(प्रभास) कातियुक्त। (प्रबोध) जगानेवाला। (प्रबुद्ध) सचेत, खिला हुआ। (रिक्त) शून्य,
निर्धन। (परिपक्व) पूर्ण पका हुआ। (मन्द्र) मनमोहक। (ज्वलंत) प्रकाशित। (चैतन्य)
चित्त स्वरूप आत्मा। (सहृदयता) सीजन्य, भलमनसी, सुजनता। (सौमनस्य) आनन्द ।
(ग्रस्त) पकड़ा हुआ। (प्रपञ्च) धोखा, आडम्बर। (अनुप्राणित) जीवन्त। (जयद) जीतनेवाला।










