1. प्रारंभिक जीवन एवं परिवार
1.1 जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
- कान्होजी आंग्रे का जन्म 1669 ईस्वी में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था।
- उनके पिता तानाजी आंग्रे, छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में एक प्रमुख सेनानायक थे।
- पिता के प्रभाव से ही कान्होजी को बचपन से ही युद्ध-कौशल और सैन्य नेतृत्व की शिक्षा मिली।
2. मराठा नौसेना का उत्थान
2.1 पश्चिमी तट का प्रशासक नियुक्ति
- युवावस्था में कान्होजी आंग्रे को सतारा के प्रमुख द्वारा पश्चिमी तट का प्रशासक बनाया गया।
- इस पद पर रहते हुए उन्होंने समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया और मराठा नौसेना का विस्तार किया।
2.2 मराठा नौसेना का प्रमुख (सरखेल) बनना
- छत्रपति शाहू जी ने उनकी सामरिक कुशलता को पहचानते हुए उन्हें 1698 में मराठा नौसेना का प्रधान (सरखेल) नियुक्त किया।
- उन्होंने मराठा साम्राज्य की नौसेना को संगठित कर उसे एक अजेय शक्ति बना दिया।
3. कान्होजी आंग्रे के प्रमुख सैन्य अभियानों
3.1 ब्रिटिश, डच और पुर्तगालियों से संघर्ष
- कान्होजी आंग्रे ने अपने जीवनकाल में ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली नौसेनाओं को अनेक बार परास्त किया।
- उन्होंने पश्चिमी तट पर अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी, पुर्तगालियों और डच व्यापारियों की गतिविधियों पर लगाम लगाई।
- अंग्रेजों ने उन्हें हराने के लिए कई प्रयास किए लेकिन कभी सफल नहीं हो पाए।
3.2 अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर नियंत्रण
- कान्होजी आंग्रे को पहला भारतीय सेनानायक माना जाता है जिसने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर नौसैनिक अड्डा स्थापित किया।
- उन्होंने इन द्वीपों को भारत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3.3 व्यापार मार्गों की रक्षा
- कान्होजी ने समुद्री व्यापार को सुरक्षित करने के लिए मुंबई, कोंकण और मालाबार तटों पर अपने किले और नौसैनिक अड्डे बनाए।
- उन्होंने व्यापारिक जहाजों से सुरक्षा शुल्क (Protection Tax) लिया जिससे मराठा साम्राज्य की आय में वृद्धि हुई।
4. अपराजित योद्धा: कान्होजी आंग्रे
4.1 ब्रिटिश-फ्रांसीसी संयुक्त हमला
- 1720 में ब्रिटिश और पुर्तगालियों ने मिलकर कान्होजी आंग्रे को हराने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया।
- लेकिन उनकी नौसैनिक शक्ति और रणनीति के सामने विदेशी शक्तियां असफल रहीं।
- उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी कोई युद्ध नहीं हारा और मराठा नौसेना को अजेय बनाए रखा।
5. अंतिम समय और विरासत
5.1 निधन
- 4 जुलाई 1729 को कान्होजी आंग्रे का निधन हुआ।
- उनके निधन के बाद भी उनकी बनाई हुई मराठा नौसेना वर्षों तक विदेशी शक्तियों के लिए खतरा बनी रही।
5.2 कान्होजी आंग्रे की स्मृति में सम्मान
- 15 सितंबर 1951 को भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान का नाम आई.एन.एस. आंग्रे रखा गया।
- मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई।
6. निष्कर्ष
कान्होजी आंग्रे भारत के सबसे महान नौसेनानायकों में से एक थे। उन्होंने मराठा साम्राज्य की नौसैनिक शक्ति को मजबूत किया और ब्रिटिश, डच और पुर्तगालियों को भारतीय समुद्र तट पर चुनौती दी। उनकी वीरता, नेतृत्व क्षमता और अपराजेयता उन्हें भारत के इतिहास में एक अमर योद्धा के रूप में स्थापित करती है।
विस्तृत जीवन परिचय
मराठा नौ सेना के सर्वाधिक प्रसिद्द सेनानायक, अठ्ठाहरवीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच एवं पुर्तगाली नौ सेनाओं के छक्के छुड़ा देने वाले, भारत को प्रथम बार नौ सेना की महत्ता से अवगत कराने वाले एवं अपने अंत समय तक अपराजित रहे महान योद्धा कान्होजी आंग्रे उपाख्य सरखेल आंग्रे की आज पुण्यतिथि है| 1669 को कोकण के रत्नागिरी जिले में जन्में कान्हो जी के पिता तानोजी आंग्रे छत्रपति शिवाजी की सेना में नायक थे और इस कारण प्रारंभ से ही कान्होजी युद्ध कौशल में निपुण हो गए| युवावस्था प्राप्त करने पर उन्हें सतारा के प्रमुख द्वारा पश्चिमी तट का प्रशासक नियुक्त किया गया और यहीं से शुरू हुआ समुद्र के साथ उनका तारतम्य जो उनके जीवन के अंत तक रहा| छत्रपति शाहू जी द्वारा उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें मराठा नौ सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया और अपने कौशल के बल पर उन्होंने इसे उस ऊँचाई पर पहुंचा दिया कि ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली उनके नाम से भी भय खाते थे| ये कान्होजी आंग्रे ही हैं जिन्हें अंडमान द्वीप समूह को भारत से जोड़ने का श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ही पहली बार वहां अपना बेस स्थापित किया| उनके युद्धकौशल और रणनीतिक चातुर्य का पता इसी बात से चलता है कि विदेशी ताकतों के मिले जुले अभियान भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके और वे अपने अंत समय तक अपराजित रहे| 4 जुलाई 1729 को ये महान नौसेनानायक इस संसार से विदा हो गया पर अपने पीछे एक सशक्त मराठा नौसेना छोड़ गया जिसकी धमक कई वर्षों तक विदेशियों के दिलों में बनी रही| स्वतंत्रता पूर्व भारत के सबसे महान नौसेनानायक माने जाने वाले कान्होजी आंग्रे के सम्मान में भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान का नाम 15 सितम्बर 1951 से आई.एन.एस. आंग्रे कर दिया गया और दक्षिणी मुंबई के नेवल डाकयार्ड में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गयी|
~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें कोटिशः नमन एवं श्रद्धांजलि!










