कामधेनु

0
20

अचोदसो नो धन्यन्त्विन्दवः प्र स्वानासो बृहद्देवेषु हरयः

विचिदश्नानां इषयो अरातयोऽर्यो नः सन्तु सनिषन्तु नो धियः

ऋ. ६.१६.१ साम. ५५५

तर्जः साधो देखो जग बौराना (कबीर)

प्रभुजी! धन्य हुआ यहाँ आना

युग युगान्तरों तक बौराए, अब कहाँ हमें समझाना?

बहिर्मुखी, अन्तर्मुख हो गईं सु प्रवृत्तियाँ सारी

आत्म-अनात्म का भेद भी समझा मिल सिद्धियाँ प्यारी

दौड़ धूप भी छूटी अनात्म की निज स्वरूप जब जाना ॥ प्रभुजी…

फँसे थे हम कितने प्रकृति में ज्ञान न था आत्मा का

ज्ञेय बस्तुएँ जानते-जानते ज्ञान हुआ ज्ञाता का

जन्मो-जन्म से चक्कर खाए अब निस्तार है पाना ॥ प्रभुजी…

यज्ञरूप हो गई क्रियाएँ वना शरीर वेदी सा

इन्द्रियाँ वन गई देव हमारी, अणु अणु देव ही दीखा

ज्योतिर्मय की ज्योति पाके आत्मा को है प्रगटाना ॥ प्रभुजी…

ग्रह-उपग्रह गति कर रहे, दौड़ती वायु सरपट

कल कल नदियाँ वही जा रही अणु-अणु घूमे सर्वत

यही तो है मनोवृत्ति यज्ञ की, यज्ञ को ही अपनाना ॥ प्रभुजी…

दान-द्युति दाता की पाकर वने लोक भी द्युलोक

समाँ वैध गया अजव अपूर्व सा खिले हैं ज्ञान व ज्योत

किरणें वनी तन्त्री के तार सी और गुञ्जिन हुआ गाना ॥ प्रभुजी…

घूमन्तर हो गई कृपणता, परोपकारी मन जागा

परोपकार की यज्ञशाला से स्वार्थ निकल कर भागा

लिप्सा भोग आलस्य ईर्ष्या का टूटा ताना बाना ॥ प्रभुजी…

परोपकार, निष्काम कर्म, और यज्ञरूप है ये लोक

करे प्रेरणा किसको, यहाँ पर ना है प्रमाद ना शोक

सन्तुष्टि समृद्धि सिद्धि का, भर गया ख्यात-खजाना ॥ प्रभुजी…

स्वयं कामधेनु है इच्छा शुभसंकल्प में सिद्धि

किए कर्म अपना फल लाते, त्वायें सुकर्म समृद्धि

सही प्रार्थना करो प्रभु से, फल पाओ मनमाना ॥ प्रभुजी…