ज्योति कभी हमसे दूर न हो

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मा नो वधैर्वरुण ये त इष्टावेनः कृण्वन्तमसुर श्रीणन्ति ।

मा ज्योतिषः प्रवसथानि गन्म वि पू मृधः शिश्रथो जीवसे नः॥७॥

ऋ. २.२८.७

तर्जः प्रणय स्वरम कादोर, तनेरम मधु पडियु

ऐ मेरे मन ! अनमोल है जीवन
ढूँढ़ जीने का उपाय
कदम कदम पर लोभ का डेरा
है तो, कैसे सँभल पायें?
॥ऐ मेरे मन॥

ये जगत है सुन्दर यज्ञ इसपे दृढ़ दृष्टि देना
करते हैं जब यज्ञ, बनते हैं स्थितप्रज्ञ
भावनाएँ होतीं सत्य, भाव बुरे होते त्यज्य
पाप कर्म ना होते उदय
यज्ञ काल में वाचाल रहती है अपाय
॥ऐ मेरे मन॥

यज्ञ के भाव से ये जग देख, दुरित विचार न लेना
जागे ना ये पाप-वृत्ति, शुद्धाचरण में ही जीना
ये जग तो है आला, प्रभु की है यज्ञ शाला
हो जा तू भी यज्ञमय
पाप कर्म तो डुबाये, यज्ञ कर्म हैं सहाय
॥ऐ मेरे मन॥

सत्याचरण और विवेक मन में धारण करना
इसका जो ले लो ज्ञान, जीवन उत्थान ही करना
प्रभु की ही पाना शरण और करना गुण वरण
पाना है अन्तस्-प्रकाश
पापाचारी दुःख ही पाये, सत्याचारी सुख प्रदाय ॥

(अपाय) पाप रहित। (स्थित प्रज्ञ) विकारों से दूर।