वह अपना घर बनाता है
प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति ।
प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्पर्यरिष्टः सर्व एघते॥
ऋ. ५.२७.१६
तर्जः बाई मी विकत घेतला श्याम
देखो भाई कितना देते प्रभु दान (2)
सृष्टि है इसका प्रमाण
॥ देखो भाई॥
जीवन रक्षण साधन सूच
अन्न का दान है जिसमें पूज्य
लिया दान, कभी देना होगा
जिसपे लिखा है हरिनाम ॥
॥कितना देते प्रभु॥
पूज्य पदार्थ का देने वाला
विपदा कष्ट को हरता सर्वशः
बना रहा मानो विशाल घर
अपने लिए महान ॥
॥ कितना देते प्रभु॥
बनिये सा जो खाये अकेला
उसको कहते सभी भेड़िया
ऐसों को भयमुख खा जाये
रहता है वो अनाम ॥
॥कितना देते प्रभु॥
घर कपड़ा गाड़ी के बिन तो
जीवन यात्रा चल सकती है
अन्न बिना संकट दुर्भिक्ष है
जाते तड़प ये प्राण॥
॥कितना देते प्रभु॥
अन्नदान तो बड़ा धर्म है
इसमें तो वृद्धि का फल है।
गृहस्थ का वृद्धि प्रमाण
तो है धन-धान्य-संतान॥
॥ कितना देते प्रभु॥
(सूच) पवित्र, पावन। (सर्वश) पूर्णतः। (अनाम) अप्रसिद्ध । (दुर्भिक्ष) अकाल










