जितेंद्रनाथ मुखर्जी (जतिन बाघा):भारत की स्वतंत्रता के अनसंग नायक

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गाथा वीरता, बलिदान और संघर्ष की कहानियों से भरी हुई है। कई वीर क्रांतिकारियों ने अपना जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए न्योछावर कर दिया। उन्हीं महान क्रांतिकारियों में से एक थे जतिंद्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें पूरा देश “बाघा जतिन” के नाम से जानता है।

उनका जीवन संघर्ष और बलिदान की अनुपम मिसाल है।

प्रारंभिक जीवन और वीरता की पहली पहचान

बाघा जतिन का जन्म 7 दिसंबर 1879 को नादिया जिले (वर्तमान बांग्लादेश) के कयाग्राम में हुआ था। उनके पिता उमेशचंद्र मुखर्जी की मृत्यु तब हो गई जब वह मात्र 5 वर्ष के थे। उनकी माता शरतशशि ने उन्हें वीरता और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। बचपन से ही वह शारीरिक रूप से बहुत मजबूत थे और युवावस्था में कुश्ती, घुड़सवारी और तलवारबाजी में निपुण हो गए।

जतिन के अदम्य साहस की पहचान तब बनी जब उन्होंने मात्र एक खुखरी (छोटे खंजर) की मदद से अपने गांव में आतंक मचाने वाले रॉयल बंगाल टाइगर को मार गिराया। इस घटना के बाद लोग उन्हें “बाघा जतिन” कहने लगे।

स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश

उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आए तो उनका संपर्क स्वामी विवेकानंद से हुआ, जिन्होंने उन्हें देश सेवा और आत्मनिर्भरता का मार्ग दिखाया। यहां उन्होंने युगांतर क्रांतिकारी संगठन से जुड़कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया। उन्होंने महर्षि अरविंद के छोटे भाई बारींद्र घोष के साथ मिलकर देवघर के पास एक बम फैक्ट्री स्थापित की।

अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियाँ

अलीपुर बम कांड (1908) में जब कई क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए, तब बाघा जतिन ने युगांतर संगठन की जिम्मेदारी संभाली। वह पूरे भारत में क्रांतिकारियों को संगठित करने लगे। उन्होंने हावड़ा षड्यंत्र केस में जेल भी काटी, जहां उनकी मुलाकात कई प्रमुख क्रांतिकारियों से हुई।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बाघा जतिन ने विदेश में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों और जर्मन सरकार से संपर्क किया। वह जर्मनी से हथियारों की आपूर्ति कराकर भारत में सशस्त्र क्रांति करने की योजना बना रहे थे। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के ठिकानों पर डकैती डालकर धन और हथियार जुटाने का कार्य भी किया।

बलिदान और अमरता

ब्रिटिश सरकार को जब इस योजना का पता चला तो उन्होंने बाघा जतिन और उनके साथियों को पकड़ने के लिए अभियान शुरू किया। बाघा जतिन अपने साथियों के साथ मयूरभंज जिले के कप्तीपदा गाँव में छिपे थे। लेकिन 9 सितंबर 1915 को पुलिस ने उन्हें घेर लिया। बालासोर (ओडिशा) में उनके साथ अंग्रेजी फौज की मुठभेड़ हुई।

जतिन और उनके साथियों ने अद्भुत वीरता दिखाई। अंग्रेजी सेना के कई सैनिक मारे गए, लेकिन अंततः बाघा जतिन गंभीर रूप से घायल हो गए10 सितंबर 1915 को उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया। मरते वक्त उन्होंने कहा—

“हमारी आत्मा अमर है, यह लड़ाई जारी रहेगी!”

बाघा जतिन का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके विचारों और रणनीतियों ने आगे चलकर रासबिहारी बोस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी आंदोलनों को प्रेरित किया। आज भी उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम के सबसे वीर सेनानियों में लिया जाता है।

रासबिहारी बोस

निष्कर्ष

बाघा जतिन केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं। उनका साहस, त्याग और देशभक्ति हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची आज़ादी के लिए आत्मबलिदान और निडरता की आवश्यकता होती है। हमें चाहिए कि हम उनके आदर्शों को याद रखें और अपने देश के लिए योगदान दें।

बाघा जतिन को कोटि-कोटि नमन!

कल 7 दिसंबर को क्रांतिकारी संगठन युगांतर के प्रमुख नेता, वीरता की प्रतिमूर्ति, बंगाल के प्रसिद्द क्रांतिकारी और कितने ही युवकों के प्रेरणाश्रोत जतिन्द्रनाथ मुखर्जी उपाख्य जतिन बाघा का जन्म दिवस था, पर अफ़सोस हम इस क्रांतिधर्मा को याद करना भूल गए| उनका जन्म वर्तमान बंगलादेश के नाड़िया जिले के कुश्तिया तालुका के कयाग्राम नामक स्थान पर उमेशचंद्र बनर्जी और शरतशशि के यहाँ 7 दिसंबर 1879 को हुआ था। जब वह 5 वर्ष के थे, उनके पिता की मृत्यु हो गयी और उनका लालन पालन उनकी माँ ने किया। जल्द ही वो अपने शारीरिक शक्ति के कारण लोगों में पहचाने जाने लगे और केवल एक खुखरी के बल पर अपने गाँव में आतंक मचा रहे रायल बंगाल टाइगर को मारने के कारण उन्हें जतिन बाघा कहा जाने लगा|

उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आने पर वो स्वामी विवेकान्द के संपर्क में आये और उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए। क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए महर्षि अरविन्द के छोटे भाई बारीन्द्र घोष के साथ मिलकर जतिन ने देवघर के पास एक बम फैक्ट्री स्थापित की जबकि बारीन ने ऐसी ही एक फैक्ट्री कोलकाता के मानिकतला में लगायी। अलीपुर बम केस में युगांतर पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जतिन ने इसका काम संभाला और बंगाल के दुसरे हिस्सों और अन्य प्रदेशों के क्रांतिकारियों से भी संपर्क स्थापित किया।

हावड़ा षड़यंत्र केस में गिरफ्तारी के दौरान हावड़ा जेल में उनका अनेकों प्रमुख क्रांतिकारियों से परिचय हुआ जो अपने अपने क्षेत्रों में अंग्रेजी प्रशासन के काल थे। यहीं उन्हें ज्ञात हुआ कि जर्मनी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने वाला है, जिससे उनके मन में भारतीय सनिकों द्वारा विद्रोह का विचार आया। 1911 में सबूतों के अभाव में वो हावड़ा केस से बरी हो गए और पुनः युगांतर पार्टी को मजबूत करने में जुट गए। मिदनापुर और हुगली में आई भीषण बाढ़ में के समय अलग अलग क्रांतिकारी संगठनों द्वारा चलाये गए सहायता कार्यों में ये सब एक दुसरे के संपर्क में आये और सबने मिलकर बघा जतिन और रासबिहारी बोस को उत्तर भारत के लिए अपना नेता चुन लिया।

उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-‘ पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है। देसी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी मांग है।’
प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होते ही यूरोप स्थित क्रांतिकारियों ने ने मिलकर इंडिया इंडिपेंडेंस पार्टी बनायीं और जर्मन सरकार से सहयोग हासिल करने में सफल रहे। इन सबके सहयोग से अस्त्र शस्त्र हासिल कर जतिन देश के भीतर विद्रोह की तैयारी कर रहे थे और इस हेतु अंग्रेजी सरकार के ठिकानों पर एक के बाद एक डकैती डाली गयी, क्योंकिं क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती ही था।

दुलरिया नामक स्थान पर भीषण डकैती के दौरान अपने ही दल के एक सहयोगी की गोली से क्रांतिकारी अमृत सरकार घायल हो गए। विकट समस्या यह खड़ी हो गयी कि धन लेकर भागें या साथी के प्राणों की रक्षा करें! अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर भागो। जतींद्र नाथ इसके लिए तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ इन डकैतियों में ‘गार्डन रीच’ की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है। इसके नेता यतींद्र नाथ मुखर्जी थे। कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कम्पनी की एक गाडी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को 52 माउजर पिस्तौलें और 50 हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सरकार हो ज्ञात हो चुका था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ की डकैतियों में यतींद्र नाथ का हाथ था।

पुलिस के सतर्क होने पर अपने साथियों के परामर्श पर जतिन उडीसा के बालासोर में रहने चले गए जो समुद्र तट के निकट होने के कारण जर्मनी से आने वाले हथियारों को जहाज से उतारने के लिए बहुत उपयुक्त था। कुछ समय बाद जतिन मयूरभंज जिले के कप्तिपदा गाँव में एक ठिकाने पर चले गए और जब वहां से भी किसी दूसरी जगह जाने की तैयारी कर रहे थे, अंग्रेजी फौज के एक बड़े दल द्वारा घेर लिए गए। जतिन और उनके साथ जंगलों और पहाड़ों से होते हुए भागते रहे पर

अंत में 9 सितम्बर 1915 को घेर लिए गए। दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी शुरू हो गयी। जतींद्र के अचूक निशाने से पुलिस अधिकारी राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया। किल्वी दल बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था और जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। 5 क्रांतिकारियों और पुलिस के एक बड़े दल के मध्य हुयी गोलीबारी में अंग्रेजों को काफी क्षति उठानी पड़ी और उनके बहुत लोग मारे गए। क्रांतिकारियों में चित्तप्रिय राय चौधरी बलिदान हुए, जतिन और जतीश गंभीर रूप से घायल हुए और मनोरंजन सेन गुप्ता और निरेन गोला बारूद ख़त्म होने पर पकडे गए।

इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर ‘पानी-पानी’ चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के सभी साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। अगले ही दिन 10 सितम्बर को बाघा जतिन बालासोर के अस्पताल में ये नश्वर संसार छोड़ गए और माँ भारती के चरणों पर बलिदान हो गए। उनके जन्म दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।