(१)
जिसके पिछले कर्म भले हैं,
मन में उसे बसावे क्या।
अन गिन जिसके साथी होते,
शत्रु उसे सतावे क्या।
निशदिन रत्न रहें हाथों में,
चोर लूट ले जावे क्या।
“धर्मी”जन प्रशंसा करते,
दोषी दोष लगावे क्या।
(२)
बुरा बुढ़ापा खाल सुकडजा,
गति नष्ट हो जाती है।
दांत गिरें और कान सुनै ना,
आंख ना मार्ग दिखाती है।
मुख से लार टपकती रहती,
बंधु भी ना साथी है।
बेटा बेरी बन जाता,
त्रिया ना सेवा ठाती है।
(३)
तन में अनगिन रोग रहें,
और औरों का उपचार करे।
सबसे कहे में कनक कमाऊं,
भोजन और के द्वारा करे।
सबसे कहे में योगीराज हूं,
दुराचार से प्यार करे।
“धर्मवीर”एैसे जन का ना,
पत कोई नर नारि करे।
(४)
दरिद्रता ना पास फटकती,
जो जन नित व्यापार करे।
मन में उसके पाप नहीं हो,
ईश को जो आधार करे।
उसको शोक नहीं होता,
जो मौन व्रत स्वीकार करे।
“धर्मवीर”भय नहीं हो उसको,
जो जनता से प्यार करे।










