मन का दीया
(तर्ज-या ख़ुदा सोई किस्मत जगा दे)
ज़िन्दगी का सफ़र करने वाले ।
अपने मन का दीया तो जला ले।
१. वक्त की धार यह कह रही है।
कष्ट क्यों आत्मा सह रही है।
देख ऐसी जगह तू खड़ा है।
ज्ञान गंगा जहाँ बह रही है।
बढ़ के गंगा में डुबकी लगा ले।
अपने मन का दीया तो…..
२. रात लम्बी है गहरा अन्धेरा ।
कौन जाने कहाँ हो बसेरा ।
तू है अनजान मन्ज़िल का राही।
चलते रहना ही है काम तेरा।
रौशनी से डगर जगमगा ले।
अपने मन का दीया तो……….
३. सूनी सूनी ये मन्जिल की राहें।
चूमना तेरे कदमों को चाहें।
गहन बन में कहीं खो न जाना ।
भटक जाएँ न तेरी निगाहें।
हर कदम सोचकर तू उठा ले।
अपने मन का दीया तो………..
४. बस तुझे है अकेले ही चलना।
बहुत मुमकिन है गिरना फिसलना।
गिर के गिरना नहीं बात कुछ भी।
है बड़ी बात गिर के सम्भलना।
यह ‘पथिक’ बात दिल में बसा ले।
अपने मन का दीया तो……….










