जीव के लिए सारा संसार

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ओ३म् । तुभ्येमा भुवना कवे महिम्ने सौम तस्थिरे। तुभ्य॑मर्षन्ति सिन्धवः

तर्जः मरिविल पुन्गुई ले मनीवांग

प्रभु तुमसे प्यार करता रहूँगा
ऋत-सत्य नियमों पे चलता रहूँगा
ज्ञानानुसार कर्म, करता रहूँगा
ऐसे में मार्ग दर्शन क्या करोगे?
में सहाय प्रभु क्या तुम बनोगे ?
प्यार प्रभु…

होई यारो हुई या हुई या (4)
प्रश्न तो उठता, ये जग प्रभु क्यों रचता?
‘आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः’ वेद कहता
लोकों में ये जीव बारम्बार विचरता
जग-विधान जीवों के हेतु प्रभु करता
जीव है इसका उपभोक्ता
जो बने यज्ञमय ‘होता’
ऐसे में सहाय… प्यार प्रभु…

द्यौ से पृथ्वी तक जो हैं जन्य पदारथ
एक भी जन्य पदारथ ना है अकारथ ।
औषधि जल वन उपवन धान्य धनागम
भोग साधन हैं सचमुच सुख-साधन ।
करना सदुपयोग सुधन वरना है
दुरुपयोग, निधन बुद्धजीव, कर स्मरण
ऐसे में सहाय… प्यार प्रभु…

(आवरीवर्ति भुवनेष्वन्तः) जीव पुनः पुनः इन लोकों में आता जाता है। (ऋ. १०.१६६.३)
(‘होता’) यज्ञकर्ता। (इन्द्राय द्यावओषधीरुतायोरयिं रक्षन्ति जीरयो वनानि ॥)
ऋ. ३.५१.५ जीव के लिए घी लोक है, औषधियाँ और जल वनादि सब मिलकर
जीव के लिये धन की रक्षा करती है। (अन्तरा नं. 2)