जीने को तो तू जी रहा

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जीने को तो तू जी रहा

जीने को तो तू जी रहा
विषयों में मन लगाये क्यूँ
मन तो तेरा भटक रहा
मन को तू व्यर्थ सताये क्यूँ ?

मुख से कहे कड़े वचन,
बदले में ना हुए सहन
हम दर्द ना कभी हुआ
मन में दया न आए क्यूँ
जीने को तो तू जी रहा

पापों से मन हटा नहीं,
सत् कर्म में लगा नहीं
काँटों की राह पे जिन्दगी
चोट पे चोट खाये क्यूँ
जीने को तो तू जी रहा

आबाद खुद भी न हुआ,
बरबाद औरों को किया
दुखियों को तू सताये क्यूँ
लेता रहा तू हाय क्यूँ
जीने को तो तू जी रहा

धर्म पे ना तेरा चलन
ऋषियों का ना सुना कथन
बन्दे ये तेरी भूल है
धरम से निजात पाए क्यूँ
जीने को तो तू जी रहा

मन से हटा मद – मोह को
लोभ काम – क्रोध को
बाकी जन्म सँवार के
प्रभु की शरण न आए क्यूँ
जीने को तो तू जी रहा

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई

निजात = छुटकारा