“जागृति मेरी जब से हुई है पाप हुए हैं परिहारी”ईश्वर भक्ति भजन

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ओ३म् पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ जा꣡गृ꣢वि꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यः꣢ ।
त्वं꣡ विप्रो꣢꣯ अभवोऽङ्गिरस्तम꣣ म꣡ध्वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ मि꣢मिक्ष णः ॥५१९॥
सामवेद 519

जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
देह-पुरी बनी जीवन-निवासक
सत्य-सुमत सांद्रकारी
सत्य, सत्य सुमत साद्रकारी

ऐ मेरी जान!
पहले तुम सोई थी
जागी हो, हुई हो सचेत
तब से पुरी के देवों में जागा है
सात्विक सत्य-सुमेध
इन्द्र के बोध से वे बन गए हैं
स्वच्छ निर्मल आनन्दकारी
स्वच्छ, स्वच्छ निर्मल आनन्दकारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी

सत्ता तुम्हारी जगाती है हर अङ्ग
आठों पहर हैं रोमांचित
इस सोच से कि प्रीतम का है सानिध्य
रोंगटे खड़े हैं समुचित
नस नाड़ियाँ प्यार में उठ के उमड़ीं
अनुभूतियाँ है सुखारी
सुखारी, अनुभूति है सुखारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी

प्राणों के प्राण हे आदृत आत्मा
क्या ब्राह्मण हो ?
ब्रह्मपुत्र, प्रभु के ?
अमृत प्रभु के क्या अमृत पुत्र हो?
देवों में अनवर अनूठे
सत्ता तुम्हारी देवपुरी के,
देवों के हेतु हितकारी
हितकारी, देवों के हेतु हितकारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
देह-पुरी बनी जीवन-निवासक
सत्य-सुमत सांद्रकारी
सत्य, सत्य सुमत साद्रकारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी