जग में जिए सबके लिए देव दयानन्द का यह आर्य समाज ।
तर्ज: मैं हूं गंवार मुझे सब से है प्यार
जग में जिए सबके लिए देव
दयानन्द का यह आर्य समाज ।
दुनियां कहे करता रहे आर्य समाज
सारी दुनियां पे राज ।
जग में जिए सब …..
धारण जब से नाम किया,
पल भी नहीं आराम किया ।
सबकी नज़र हैरान हुई,
जीवन में वह काम किया ।
धरती पे जिसकी मिसाल नहीं आज ।
जग में जिए सब …..
तूफानों से लड़ता रहे,
चीर के सागर बढ़ता रहे ।
सह न सके अन्याय कभी,
जुल्म के आगे अड़ता रहे ।
बंधा रहे सर पे सफलता का ताज ।
जग में जिए सब …..
फर्ज में दिन और रात है क्या,
सांझ है क्या परभात है क्या।
पर उपकार की राहों में,
इस जीवन की बात है क्या।
प्यारी इसे जान से वतन की है लाज ।
जग में जिए सब …..
दुखियों का ग़मख़ार है यह,
देश का पहरेदार है वह ।
भारत के दुश्मन के लिए
दो धारी तलवार है यह ।
करता है ” पथिक ” यह सबका इलाज ।
जग में जिए सब …..










