जब कोई धूप से व्याकुल होता है

0
6

उप॑ च्छायाम॑िव॒ घृणेरग॑न्म॒ शर्म ते व॒यम् । अग्ने॒ हिर॑ण्यसंदृशः॥

तर्जः मानयिन यारो मन्दोड़केत

जब कोई धूप से होता है व्याकुल
छाँव वो ढूँढता है तरु की, शीतल
छाया से विश्राम पाके होता अनाकुल (2)
जगत्पते! छाया दे जग-संतापों को हर ले॥ ॥जब कोई॥

यद्यपि तुम अग्नि हो लेकिन घृणी हो
स्वर्ण सदृश तेज वाली महाज्योति हो
तेजोमय अग्नीय हो चहुँ दिसी प्रदीप्त हो
शरणागत निडर है क्योंकि प्रभु तुम तो अभीत हो जगत्पते!
छाया दे जग सन्तापों को हर ले। ॥जब कोई॥

धारणकर्ता को ना ये तेज़ जलाता
ये तो मनमोहक है पूर्ण शांतिदाता
तेरी शरण शम्प्रकर्ष, करती शमित दुःख-दुर्तम
आसुरी छाया में, पले छलछिद्र छद्म छेदन
जगत्पते! छाया दे जग संतापों को हर ले ॥ ॥जब कोई॥

जग-सन्तापों से हुए हम क्लान्त व कातर
बने असभ्य अशांत आसुरी छाया पाकर
ईशों के हे परमेश, तेरी छाया में रहें सचेत
अब तो ना रहा राग द्वेष न अघ ना अवलेप
जगत्पते छाया दे जग संतापों को हर ले॥ ॥जब कोई॥

(अनाकुल) जो उलझन में ना हों। (घृणी) ज्योतिर्मय। (अग्नीय) अग्नि संबंधी। (अभीत)
निडर। (शम्प्रकर्ष) संतति की सर्वोपरिता। (शमित) शांत। (दुर्लभ) दुर्भाग्य, संकट।
(छल-छिद्र) चाल धोखा। (छद्य) छल धोखा, कपट, जालसाजी। (छेदन) टुकड़े टुकड़े करना,
विभक्त करना। (क्लान्त) थका हुआ, मुरझाया हुआ। (कातर) डरपोक, भीरू।
(अघ) पाप। (अवलेप) घमंड। (दुर्तम) दुर्भाग्य।