इन्द्र की अर्चना

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इन्द्रया॑येन्दो म॒रुत्व॑ते॒ पव॑स्व॒ मधुमत्तमः ।

ऋतस्य योन॑िमा॒सद॑म् ।। साम. ४७२, १०७६ ऋ. ६.६४.२२

तर्ज : पेररियातुर मुम्बरते प्रेम मिन्नारो विरिच्यू ॥

हे मेरे प्राणों के प्राणपति ! पूजा तुम्हारी का इच्छुक
अपनी संजीवनी से मेरा जीवन कर दो उज्जीवित परिस्फुट (2)
॥हे मेरे ॥

प्राण प्रबल, मेरा स्वास्थ्य शरीर है, अङ्ग प्रत्यङ्ग में है स्फूर्ति
ना मैं कभी चाहूँ बैठूं निठल्ला, इन्द्रियों में दो प्रभूति
सब कुछ है फिर भी जीवन नीरस है, रस से विहीन हूँ विच्युत ॥ (2)
॥हे मेरे ॥

अभिमान से है भरित मेरी शक्ति पर ऐंठन में मधु-रस कहाँ?
मधुरस तो मिलता है, प्रेम-प्रणति में बसते हैं ईश्वर जहाँ,
आनन्द तो पाता है निरभिमानी, बनता वो प्रमुग्ध-प्रस्फुट। (2)
॥हे मेरे॥

स्थिर रस तुम्हारी कृपा-कोरों में है मैंने सुना ऐसा कहते
प्रेमझरित है आकाश गङ्गा में चान्दनी चाँद ही देते
हो मेरे चित्त के चरित चाँद चारु और मैं चकोर हूँ प्रस्तुत (2)
॥हे मेरे ॥

सोम तुम्हारी ही स्निग्ध किरणों से प्रकृति सारी सरसती
आर्द्र न होता तुम्हारा हृदय तो सृष्टि संसृष्टि ना बनती।
समझा हूँ निज ताप का सही कारण तुझसे हुआ ना मैं संस्तुत (2)
॥हे मेरे ॥

अब ना रहूँ तेरी संदृष्टि से दूर, नैवेद्य-पुज् मेरे प्राण
इन्द्रियाँ मेरी अर्चना-पुष्प हैं आत्मा मेरा मधुद्यान
पूजा का नवजीवन उदित हुआ है मनआत्मा कर दो परितृप्त ॥ (2)
॥हे मेरे ॥

(परिस्फुट) पूर्ण विकसित। (प्रभूति) शक्ति, बल। (विच्युत) पथ विचलित। (भरित) भरा
हुआ। (ऐंठन) अकड़न, दुरभिमान। (प्रणति) विनम्रता। (प्रमुग्ध) अत्यन्त प्रिय। (प्रस्फुट)
पूर्ण विकसित । (चरित) प्रस्तुत, अनुष्ठित। (चारु) सुन्दर, मनमोहक। (प्रस्तुत) उमड़ा
हुआ। (संदृष्टि) एक ही परिवार में मिलकर रहना। (संस्तुत) परिचित। (नैवेद्य) पूजा
का सामान। (मधुद्यान) मधुरस का बगीचा। (परिप्तुत) तर।