इक दीया जलता हुआ लाखों जलाएगा।
(तर्ज-या मेरी मन्जिल बता या ज़िन्दगी को छीन ले)
इक दीया जलता हुआ लाखों जलाएगा।
पर बुझे लाखों से भी इक जल न पाएगा।
१. मूर्ख सौ सौ मिल के भी कुछ न सफलता पा सकें
एक ही विद्वान् सब कुछ कर दिखाएगा।
इक दीया जलता हुआ……….
२. जिस कुएँ के पास न पानी की कोई बूंद हो
वह किसी की प्यास को कैसे बुझाएगा।
इक दीया जलता हुआ…………
३. जब कि मुर्झाए हुए फूलों का भारी ढेर हो
क्या कोई भँवरा कभी नज़दीक आएगा।
इक दीया जलता हुआ……….
४. अपने पावों पर ही जो ख़ुद तो खड़ा न हो सके
किस तरह गिरते हुओं को वो उठाएगा।
इक दीया जलता हुआ………..
५. ज़िन्दगी में आप तो आचरण कुछ भी न किया
फिर दिया उपदेश भी क्या रंग लाएगा।
इक दीया जलता हुआ…………
६. जो ‘पथिक’ खुद ही नहीं मन्जिल को अपनी जानता
वो भला क्या और को रस्ता दिखाएगा।
इक दीया जलता हुआ…………










