“करणं परोपकरणं येषां केषां न ये वन्द्याः”
(जो परोपकार को ही अपना कर्तव्य मानते हैं, वे पूजनीय होते हैं।)
जन्म: फाल्गुन शुक्ल ५, शाके संवत् १८२७
स्थान: गुज्जोटी पायगा, निजाम राज्य
पिता: शिव वसप्पा
माता: रेवती बाई
शिक्षा: मराठी की सातवीं श्रेणी तक
धर्म के पथिक, आर्यसमाज के अनन्य भक्त
धर्म के प्रति समर्पण भावना से प्रेरित होकर श्री दासप्पा ने जब आर्यसमाज के सत्संगों में आना-जाना शुरू किया, तब उनका जीवन ही बदल गया। वेद प्रचार के पथ पर चलते हुए उनका नाम “वेदप्रकाश” रखा गया। उन्होंने गुज्जोटी में आर्यसमाज की स्थापना की और समाज में धर्मजागरण का कार्य आरंभ किया।
धर्मरक्षा हेतु सन्नद्ध योद्धा
लाठी-तलवार चलाने में प्रवीण वेदप्रकाश जी ने कई बार अपने ऊपर हुए प्राणघातक हमलों से साहसपूर्वक रक्षा की। जब उन्होंने पथभ्रष्ट लोगों को नारी सम्मान का पाठ पढ़ाया तो कुछ कट्टरपंथियों ने उन्हें अपना शत्रु बना लिया।
बलिदान की अमर कथा
मार्गशीर्ष ४, संवत् १९९४ को जब कुछ कट्टर मुसलमानों ने मन्त्री आर्यसमाज के घर पर हमला किया, तो निहत्थे ही वेदप्रकाश जी सहायता हेतु दौड़ पड़े। दुर्भाग्यवश २-३ सौ लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। कुछ दुर्जनों ने मिलकर उन्हें मार डाला।
यह बलिदान ना केवल आर्यसमाज के लिए था, बल्कि धर्म, न्याय और सामाजिक चेतना की रक्षा के लिए था।
न्याय व्यवस्था की विफलता, अत्याचार की आंधी
हालांकि आरोपियों की पहचान हुई, साक्ष्य भी मिले — फिर भी वे न्यायालय से बरी कर दिए गए। इस अन्याय ने हैदराबाद राज्य में एक व्यापक धर्मयुद्ध की भूमि तैयार कर दी। वेदप्रकाश जी जैसे अनेकों बलिदानी वीरों के त्याग ने भविष्य के क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी।
श्रद्धांजलि
वेदप्रकाश जी का जीवन सत्य, साहस और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है।
उनका बलिदान धर्म की मशाल बनकर आज भी हमें प्रेरित करता है।
“धर्म की राह पर चलने वाले कभी मरते नहीं, वे अमर होते हैं – प्रेरणास्तंभ बन जाते हैं।”










