हिंसा अहिंसा तीन प्रकार करते हैं जग के नर नार

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हिंसा अहिंसा तीन प्रकार करते हैं जग के नर नार

हिंसा अहिंसा तीन प्रकार,
करते हैं जग के नर नार,
यह है ऋषियों का कहना,
सदा ही सावधान रहना।

सुन्दर स्वस्थ शरीर सार्थक
जीना ही तो जीना है,
अपने से निर्बल को सताना
ही आचरण कमीना है।
तन से दुख पहुँचा करके
यदि किसी के हक को छीना हैं,
यह शारीरिक हिंसा है
हिंसा का मार्ग सही ना है।

तन से कर नर पर उपकार,
सुखी बने जीवन संसार,
यह है ऋषियों का कहना
सदा ही सावधान रहना । ।1 ।।

मनसा निष्ट चिन्तनम ही मानसिक
हिंसा कहलाती है,
ईर्षा द्वेष कपट से प्राणियों
को पीड़ा पहुँचाती है।

मन से मिथ्या निश्चय वृत्तिपापो
को पनपाती है,
पराया द्रव्य हरण की चेष्टा
भी हिंसा कहलाती है।

मन के शुभ संकल्प उभार,
जीवन की कर नैया पार,
यह है ऋषियों का कहना
सदा ही सावधान रहना।।|2 ||

सत्य सार्थक मीठी वाणी
ही बोलो जब भी बोलो,
मिथ्या क्रूर कठोर वचन से
मत किसी का हृदय छोलो।

अनुचित वाणी का प्रयोग,
वाचिक हिंसा आँखें खोलो,
शब्दों का उच्चारण सीखो
क्यों अमृत में विष धोलो।
मृदु वचन जीवन का सार,
चंहु दिश सुखों की बौछार,
यह है ऋषियों का कहना
सदा ही सावधान रहना ।।३।।

हिंसा की वृत्ति जीवन में,
मानवता का नाश करै,
लौकिक और पारलौकिक
सुख सुविधाओं का ह्रास करै,
अहिंसा प्रवृत्ति जीवन में
मानवता का विकास करै,
उसे सफलता मिल जाती है,
‘प्रेमी’ जो प्रयास करै।
प्यार के बन्धन में संसार,
समझे प्राणी मात्र परिवार,
यह है ऋषियों का कहना
सदा ही सावधान रहना।।4।।

रूबाई

पड़े मुसीबत मुझ पर इतनी
कि सभी मुसीबत कम हो जायें
थके ना दिल की कभी जवानी
चाहे स्वांस खत्म हो जायें
दुखों की भट्ठी में तप कर
इतना खून गर्म हो जाये
कि पत्थर पर भी पांव धरूँ
तो वह भी जरा नरम हो जाये