हेमू कालाणी:

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स्वतंत्रता संग्राम का युवा नायक 🇮🇳

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन कुछ क्रांतिकारियों की शहादत इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गई। हेमू कालाणी भी उन्हीं अमर बलिदानियों में से एक थे, जिनके लिए कारावास की पीड़ा और मृत्यु का भय कोई मायने नहीं रखता था। अपने देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, और फांसी के तख्ते पर जाते समय भी उनका हृदय मातृभूमि के प्रति प्रेम से ओतप्रोत था।

हेमू कालाणी का बलिदान इस बात का प्रमाण है कि जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य के लिए समर्पित होता है, तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी उसकी राह नहीं रोक सकतीं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जब वे फांसी की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उनका वजन बढ़ गया था—जो कि किसी मृत्यु दंड प्राप्त कैदी के लिए असंभव माना जाता है। यह उनकी अटूट मानसिक शक्ति और मातृभूमि के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। उनकी अंतिम इच्छा भी यही थी कि वे पुनः भारत माता की गोद में जन्म लें और फिर से उसके लिए अपने प्राणों की आहुति दें।


हेमू कालाणी का प्रारंभिक जीवन 🌱

हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सुक्कर शहर में हुआ था। उनके पिता पेशूमल कालाणी और माता जेठी बाई थीं। बाल्यकाल से ही वे स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और प्रचार में रुचि लेने लगे थे। लेकिन जल्द ही उनका झुकाव क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर हो गया, और वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में कूद पड़े।


क्रांतिकारी गतिविधियों में योगदान 🔥

हेमू कालाणी कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे, जिनमें अंग्रेजी सरकार के वाहनों पर बम हमले भी शामिल थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और इस आंदोलन को सिंध में नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए यूरोपियन बटालियन भेजने का निर्णय लिया।

जब हेमू को यह जानकारी मिली कि ब्रिटिश सेना और हथियारों से भरी ट्रेन उनके कस्बे से होकर गुजरेगी, तो उन्होंने इसे रोकने के लिए ट्रेन की पटरियाँ उखाड़ने की योजना बनाई। 23 अक्टूबर 1942 की रात, उन्होंने अपने साथियों के साथ बिना किसी औजार के, केवल अपने हाथों से ही फिशप्लेट उखाड़ने का प्रयास किया। लेकिन इससे पहले कि वे अपनी योजना को पूरी तरह अंजाम दे पाते, ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें देख लिया।

अपने साथियों को बचाने के प्रयास में हेमू पकड़े गए। उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने अमानवीय यातनाएँ दीं, लेकिन उन्होंने अपने किसी भी साथी का नाम नहीं बताया। अंततः उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।


हेमू कालाणी की शहादत 🕊️

सिंध के लोगों ने उनकी फांसी रोकने के लिए भरसक प्रयास किए। उनके वकील पीरजादा अब्दुल सत्तार ने उनके चाचा के साथ मिलकर एक माफीनामा तैयार किया, जिसमें शर्त रखी गई थी कि यदि हेमू अपने क्रांतिकारी साथियों की जानकारी पुलिस को दे दें, तो उनकी सजा माफ कर दी जाएगी।

उनकी माँ ने भी उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन हेमू कालाणी के लिए यह असंभव था। उनके मन में केवल एक ही संकल्प था—माँ भारती की सेवा और स्वतंत्रता संग्राम के लिए बलिदान। 21 जनवरी 1943 को, मात्र 18 वर्ष की आयु में, उन्हें फांसी दे दी गई। हेमू कालाणी का यह बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमर गाथा बन गया।


हेमू कालाणी की स्मृति और सम्मान 🏅

भारत-पाक विभाजन के बाद, हेमू की माँ को पाकिस्तान में धार्मिक उन्माद के कारण भारत आना पड़ा। स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने हेमू कालाणी के बलिदान को सम्मानित करने के लिए कई प्रयास किए।

इंदिरा गांधी सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 21 अगस्त 2003 को संसद भवन में उनकी प्रतिमा स्थापित की।

दुर्भाग्यवश, पाकिस्तान की सरकार ने उनके बलिदान को भुलाने का प्रयास किया। उनके जन्मस्थान सुक्कर में स्थित “हेमू कालाणी पार्क” का नाम बदलकर “कासिम पार्क” कर दिया गया। लेकिन इतिहास को मिटाना संभव नहीं है—हेमू कालाणी का नाम हर भारतीय के हृदय में अमिट रूप से अंकित रहेगा।


अमर बलिदानी हेमू कालाणी को श्रद्धांजलि 🙏

हेमू कालाणी का जीवन त्याग, बलिदान और अडिग साहस का प्रतीक है। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि मातृभूमि के लिए समर्पण से बढ़कर कोई धर्म नहीं। आज भी उनका बलिदान हमें प्रेरित करता है कि हम अपने राष्ट्र के गौरव और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए सदैव तत्पर रहें।

कोटिशः नमन इस महान योद्धा को! जय हिंद! 🇮🇳✨

विस्तृत जीवन परिचय

हेमू कालाणी क्रांतिकारियों और शहीदों की उस अनन्यतम श्रंखला की एक अटूट कड़ी हैं जिनके लिए कारावास की यंत्रणा कोई अर्थ नहीं रखती और मृत्यु कोई भय नहीं रखती| अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए परम बलिदान करते समय वो इतने प्रसन्न थे कि फांसी की प्रतीक्षा करने के दौरान उनका वजन बढ़ गया था, जो मौत की सजा पाए किसी कैदी के लिए असंभव ही है| उनकी अंतिम इच्छा थी- पुनः माँ भारती की गोद में जन्म लेकर फिर से इसी के लिए अपने प्राणोत्सर्ग करना|

२३ मार्च १९२३ को वर्तमान पाकिस्तान के सिंध में सुक्कर में पेशूमल कालाणी एवं जेठी बाई के घर जन्मे राही हेमन यानी हेमू कालाणी बचपन से ही स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रचार करने लगे थे पर जल्दी ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए और अंग्रेजी सरकार से सम्बंधित वाहनों पर कई बम हमलों में शामिल रहे|

१९४२ में भारत छोडो आन्दोलन में हेमू ने सक्रिय योगदान दिया और इस आन्दोलन को इस ऊँचाई तक पंहुचाया कि अंग्रेजी सरकार को इसके दमन के लिए यूरोपियन बटालियन भेजनी पड़ी| जब हेमू को यह पता लगा कि इन सैनिकों और हथियारों को लेकर सिंध आ रही ट्रेन उनके ही कस्बे से गुजरेगी तो उन्होंने फिशप्लेट उखाड़ कर इसे विफल करने कि योजना बनायी ताकि ट्रेन ना आ सके| चूँकि उनके पास कोई भी औजार नहीं था और समय भी कम था इसलिए २३ अक्टूबर १९४२ कि रात हेमू और उनके साथियों ने हाथों से ही इस काम को करना शुरू किया पर काम समाप्त होने के पहले ही ब्रिटिश सैनिकों की नजर उन पर पड़ गयी|

अपने साथियों को बचने के प्रयास में हेमू पकडे गए और उन पर अपने साथियों का नाम बताने के लिए भीषण अत्याचार किये गए पर मात्र १८ वर्ष के हेमू अडिग बने रहे| उनको फांसी की सजा सुनाई गयी जिसके खिलाफ सिंध भर से आवाजें उठीं और उनके वकील पीरजादा अब्दुल सत्तार उनके चाचा जी के साथ एक माफीनामा उनके पास दस्तखत करने के लिए लाये, जिसमें इस शर्त पर उन्हें माफ़ करने की बात कही गयी थी कि वो अपने साथी क्रांतिकारियों के बारे में सारी सूचनाएँ पुलिस को दे देंगे| उनकी माँ ने भी उस रात जब हेमू को फांसी दी जानी थी, इस हेतु उनसे काफी कहा सुना पर हेमू के लिए इन्हें स्वीकार करना असंभव था| उन्हें २१ जनवरी १९४३ को फांसी पर लटका दिया गया और माँ भारती का ये सपूत माँ की बलिवेदी पर बलिदान हो गया|

भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान में धार्मिक उन्माद के कारण हेमू की माँ भारत आ गयीं| इंदिरा सरकार ने हेमू की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया, जबकि अटल सरकार ने २१ अगस्त २००३ को हेमू की एक प्रतिमा संसद भवन में स्थापित कर इस अमर बलिदानी को अपनी श्रद्धांजलि भेंट की| हाँ, उस सिंध में जो हेमू की जन्मभूमि और कर्मभूमि है, आज उनका कोई स्मारक नहीं क्योंकि पाकिस्तान की इस्लामी सरकार कसी हिन्दू को सम्मानित करने का सोच भी कैसे सकती है, और शायद यही वजह है कि सुक्कर के हेमू कालाणी पार्क का नाम बदल कर कासिम पार्क कर दिया गया| पर हमारे हृदयों में हेमू सदैव जीवित रहेंगे| कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

साभारहेमू कालाणी क्रांतिकारियों और शहीदों की उस अनन्यतम श्रंखला की एक अटूट कड़ी हैं जिनके लिए कारावास की यंत्रणा कोई अर्थ नहीं रखती और मृत्यु कोई भय नहीं रखती| अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए परम बलिदान करते समय वो इतने प्रसन्न थे कि फांसी की प्रतीक्षा करने के दौरान उनका वजन बढ़ गया था, जो मौत की सजा पाए किसी कैदी के लिए असंभव ही है| उनकी अंतिम इच्छा थी- पुनः माँ भारती की गोद में जन्म लेकर फिर से इसी के लिए अपने प्राणोत्सर्ग करना|

२३ मार्च १९२३ को वर्तमान पाकिस्तान के सिंध में सुक्कर में पेशूमल कालाणी एवं जेठी बाई के घर जन्मे राही हेमन यानी हेमू कालाणी बचपन से ही स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रचार करने लगे थे पर जल्दी ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए और अंग्रेजी सरकार से सम्बंधित वाहनों पर कई बम हमलों में शामिल रहे| १९४२ में भारत छोडो आन्दोलन में हेमू ने सक्रिय योगदान दिया और इस आन्दोलन को इस ऊँचाई तक पंहुचाया कि अंग्रेजी सरकार को इसके दमन के लिए यूरोपियन बटालियन भेजनी पड़ी| जब हेमू को यह पता लगा कि इन सैनिकों और हथियारों को लेकर सिंध आ रही ट्रेन उनके ही कस्बे से गुजरेगी तो उन्होंने फिशप्लेट उखाड़ कर इसे विफल करने कि योजना बनायी ताकि ट्रेन ना आ सके|

चूँकि उनके पास कोई भी औजार नहीं था और समय भी कम था इसलिए २३ अक्टूबर १९४२ कि रात हेमू और उनके साथियों ने हाथों से ही इस काम को करना शुरू किया पर काम समाप्त होने के पहले ही ब्रिटिश सैनिकों की नजर उन पर पड़ गयी| अपने साथियों को बचने के प्रयास में हेमू पकडे गए और उन पर अपने साथियों का नाम बताने के लिए भीषण अत्याचार किये गए पर मात्र १८ वर्ष के हेमू अडिग बने रहे| उनको फांसी की सजा सुनाई गयी जिसके खिलाफ सिंध भर से आवाजें उठीं और उनके वकील पीरजादा अब्दुल सत्तार उनके चाचा जी के साथ एक माफीनामा उनके पास दस्तखत करने के लिए लाये, जिसमें इस शर्त पर उन्हें माफ़ करने की बात कही गयी थी कि वो अपने साथी क्रांतिकारियों के बारे में सारी सूचनाएँ पुलिस को दे देंगे|

उनकी माँ ने भी उस रात जब हेमू को फांसी दी जानी थी, इस हेतु उनसे काफी कहा सुना पर हेमू के लिए इन्हें स्वीकार करना असंभव था| उन्हें २१ जनवरी १९४३ को फांसी पर लटका दिया गया और माँ भारती का ये सपूत माँ की बलिवेदी पर बलिदान हो गया|भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान में धार्मिक उन्माद के कारण हेमू की माँ भारत आ गयीं|

इंदिरा सरकार ने हेमू की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया, जबकि अटल सरकार ने २१ अगस्त २००३ को हेमू की एक प्रतिमा संसद भवन में स्थापित कर इस अमर बलिदानी को अपनी श्रद्धांजलि भेंट की| हाँ, उस सिंध में जो हेमू की जन्मभूमि और कर्मभूमि है, आज उनका कोई स्मारक नहीं क्योंकि पाकिस्तान की इस्लामी सरकार कसी हिन्दू को सम्मानित करने का सोच भी कैसे सकती है, और शायद यही वजह है कि सुक्कर के हेमू कालाणी पार्क का नाम बदल कर कासिम पार्क कर दिया गया| पर हमारे हृदयों में हेमू सदैव जीवित रहेंगे| कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|लेख के अनुसार विस्तारित रूप से आर्टिकल दिन इमोजी लगाकर

साभार_____विशाल अग्रवाल