हे समर्थ परमेश्वर

0
13

दृते दृहं मा।
ज्योक्ते सुन्दृर्शि जीव्यासं ज्योक्तै सन्दृर्शि जीव्यासम् ॥ यजु. ३६/१६

तर्जः माविन चोटिले मळ्मुळले मधुरमाय-086/214 राग मिश्र खमाज

भाजन बन जाऊँ मैं तेरा प्रभुजी, लग जाए तुझमें ही मन।
परमानन्द पिला दे, सरस रस, तुझमें हो जाए समर्पण
करता रहे मनवा तेरा भजन, मन में रम जाए ओ३म् की धुन
रहे शुद्ध सदा ही मन वचन करम॥ भाजन बन…

कली तेरे बाग की खिलने को तरसे, देदे प्रेम का सींचन
भर दे इसमें विविधि रंग
जीवन-पुष्प को कर दे सुगन्धित खिल जाए मेरा अङ्ग-अङ्ग
संग वाणी आत्मा प्रबुद्ध मन
ना पाप छाये ना गर्व, ना राग द्वेष अनर्थ
दिया तूने जीवन का स्वर्ग, यूँ बीत जाए ना व्यर्थ
तेरी देख रेख में ही बीते जनम ॥ भाजन बन…

वेद की छाँव में मैं पल पल कर, पा जाऊँ मैं भी अमर पद
बढ़ जाए आत्मा का कद
पूजा-प्रेम कर्तव्य सिखा दे मन वीणा कर स्वरवत्
हर ले भय ईर्ष्या और मद
मुझे गोद में बिठा के पाठ प्रेम का सिखा दे
धन माल का करूँ क्या, जो दूरियाँ करा दे
तेरी देख रेख में ही बीते जनम ॥
भाजन बन…

श्रद्धा प्रेम विनय भक्ति का, ज्ञान भी पाऊँ तुम्हारा
चाहूँ तेरा सुखद सहारा
तेरे सम्यक दर्शन में ही, बीते जीवन प्यारा
मैं जन्म ना चाहूँ दोबारा
रहूँ तुझसे ना कभी दूर, तू लक्ष्य मेरा है पूर
माता-पिता है तू रक्ष, मैं तेरा लाडला वत्स
तेरी देख-रेख में ही बीते जनम ॥
भाजन बन…