हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये

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ओ३म् विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव ।
यद्भ॒द्रं तन्न॒ आ सु॑व ।। ३ ।।
यजुर्वेद 30/3

हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये
जो भी शुभ हो – वो कृपा कर दीजिये

सर्व-मङ्गल के लिए – शुभ भावना
हो मेरा हर कृत्य और हर कामना
बुद्धि को शुभ ज्ञान का वर दीजिये
हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये

शुभ घटित हो देव !! जीवन में मेरे
शुभ उठे संकल्प, इस मन में मेरे
मन की वीणा को भी शुभ-स्वर दीजिये
हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये

दो प्रभो !! आशीष मैं ऐसा बनूँ
शुभ करूँ, शुभ ही बनूँ, शुभ ही गुनूँ
मेरे जीवन का तमस हर लीजिये
हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये
जो भी शुभ हो वो कृपा कर दीजिये
हे प्रभो !! दुर्गण मेरे – हर लीजिये