हे ज्ञानमय सोम !

यत्र ज्योतिरजस्त्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् तस्मिन्मां

देहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परिस्रव।। ऋः ६.११३.७

तर्जः मृदुवा गवेतु कवि मिदवा

आत्मा को दर्शन की चाह
हे सोम ! अमृतमय आ तू
हे ज्ञानमय भक्ति भाव
आत्मा में ही प्रकटित हो तू
आत्मा को…

मैं तुम्हारी अद्भुत महिमा जानूँ। (2)
ऊँचे से ऊँचे लोक पे ले जाते मानूँ (2)
आत्मा को…

पहुँचा दे तू जहाँ पे ज्योति ही ज्योति (2)
आनन्दधाम जहाँ प्रेम के मोती ही मोती (2)
आत्मा को…

अमृत के उस लोक में जो है अक्षीण (2)
मृत्यु का जहाँ ना प्रवेश हो ऐसा असीम (2)
आत्मा को…

इतना तो कर सकते हो हे इन्दो! (2)
एक बूँद तरसी, दे देना मेरी चाहत को (2)
आत्मा को…

(अनात्म) आत्मा को न जाननेवाला। (विद्वेषी) शत्रु। (विभु) अत्यन्त महत्ता वाला,
महिमावान। (बर्बरता) पशुता, जंगलीपन। (घाती) हिंसक, मारने वाला। (वंशगत)
वश में रहना। (अशिवता) अकल्याणता। (प्रसार) फैलाना, विखेरना।

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