त्वं सौमासि सत्प॑ति॒स्त्वं राजोत वृत्रहा। त्वं भुद्रो अ॑सि क्रतुंः
॥ ऋः १.६१.५
तर्जः मुटुमन्द हासम मलमलियाति
हे सोम सितान्शु, है जनक तू है सत्पति
सज्जनों का रक्षक है, दे आनन्द सुख शांति ॥
न्याय पूर्वक करता सब पे शासन, राजन् तू है शक्ति सम्पन्न।
॥हे सोमः॥
ज्ञान का प्रकाशक है सुख सुभग दाता
उत्तम पदार्थों की करता है व्यवस्था
अवरोधक हैं जो तेरे ज्ञान प्रकाश में (2)
बन ते तू ‘वृत्रहा’ करता उनका हनन।
॥हे सोमः ॥
हे सोम! हे चन्द्र! हे शान्त स्वरूप
भद्र है तू सबका शान्ति प्रदाता
आन्तरिक दृष्टि से भी करता है कल्याण (2)
देता है आनन्द, बनके तू आनन्दधन॥
॥ हे सोमः ॥
शुभक्रतु कर्मशील है कर्म करता निरन्तर
जगतोत्पन धारण और करे नियोजन
जगत-प्राणियों को कर्माधार पे देता फल (2)
दुष्ट दुर्जन पे करता न कभी भी रहम ॥
॥ हे सोमः ॥
हे सोम्य! प्रभुवर देना सद्बुद्धि, सत्पुरुष सज्जन हमको बना दे
तेरे प्रेमाशीश के बने हम सुपात्र (2)
ना तो बाधक बने ना ही तोड़ें नियम ॥
॥ हे सोमः ॥
हे जग के कर्ता धर्ता हे सोमदेव, वेदोपदेश अनुसार चलें हम
जिससे पायें इस लोक में सुख वैभव
तुमसे विनय है प्रभु दे दो सुख शान्ति आनन्द ॥ ॥ हे सोमः ॥
(सितांन्शु) चन्द्रमा। (सत्पति) सज्जनों का रक्षक। (वृत्रहा) शासन करने वाला राजा।
(शुभकात) शुभकार्य करने वाला।










