हम स्वप्न में भी निर्भय होंवें

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यो मैं राजन्युज्ययो॑ वा सखा सखा वा स्वग्ने॑ भ॒यं भीरवे मह्युमाह ।

वा यो दिप्सति नो वृर्को वा त्वं तस्माद्धरूण दरूण पाद्युस्मान् ॥ ऋ. २.२८.१०

तर्ज : पूतालम पलमकई निन्दी वासन्दम

क्या कारण है प्रभुजी क्यों है भय भरम
झुक जाते हैं बन्धन के कारण
हैं दो रीत के ये बन्धन
करते हैं हमको अनमन
॥क्या कारण॥

एक तो आत्मिक भय है
पारिवारिक रिश्तों में तय है
माता-पिता पुत्र-पुत्री
भाई-बहन पति-पत्नी
हो जाता है इन से भय
जब आता है कठिन समय
उस वक्त धर्म कर्त्तव्य को भूल
आत्मविरुद्ध करते अनय
॥क्या कारण॥

शत्रु भी हैं कष्ट दायक
वैर इनका भी भयकारक
हानि करते धन माल की
डाकू और चोर हैं घातकी
होता नहीं हमें भी सहन
हम भी कर बैठते हैं पाप ही
भय ही कारण है अवनति का
हमको बनाता है पातकी ॥
॥ क्या कारण॥

दूजा है हमको पशुओं का डर
चीते भेड़िये अजगर
जाते नहीं उनके सामने
या दुश्मन हम उनके प्राण के
चाहें तो उनको प्रेम से
कर लेवें अपने वश में
या उनको उनके ही वन में
ले जाएँ प्रेम से रखने
॥ क्या कारण॥

प्रभु की उपासना से हम
क्यों नहीं जाते उसकी शरण
ईश्वर हमें ऐसी शक्ति दे
मिट जाए मन से भय भरम
जागें या सोयें, रहें अभय
अभय रहें हम हर समय
मेरे आत्मा ! आ प्रभु शरण
अन्तःकरण तू कर दे निर्भय॥
॥क्या कारण ॥

(अनमन) खिन्न, उदास (अनय) अविनीत, विनय रहित। (पातकी) गिरा हुआ, अधम।