ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्योऽहा विश्वा नृचक्षसः । तर॑न्तः स्याम दुर्गहा।
। ऋ. ८.४३.३०
तर्जः मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हूँ
तुम्हारे बताये ही कर्म करें हम, (2)
जियें, तो जियें तेरे अनुयायी बन,
सुकर्मों से बन जाये अनमोल जीवन (2)
॥तुम्हारे ॥
बड़े-छोटे काज हों तुझमें समर्पित (2)
पतित कर्म जीवन के सारे हैं अनुचित
जियें हम तेरे दीप की ज्योतियाँ बन (2)
॥तुम्हारे ॥
हों दिन रात आठों पहर तेरा पूजन (2)
यही तो है सुखमय प्रवर शान्त जीवन
तुम्हारे ही आश्रित (2) पले साँस-धड़कन (2)
॥तुम्हारे ॥
हर इक वस्तु का होवे निर्लेप दर्शन (2)
तो दृष्टि में होगा धीरज और संयम
तभी दुर्गहों से हो जावेगा तरण (2)
॥तुम्हारे ॥
बनें जो ‘नृचक्षस’ उसे भय ना खाये (2)
हर इक दिन प्रसंग सुतर होता जाये
ऐसी कृपा शक्ति बरसाना भगवन् (2)
॥तुम्हारे ॥
(अनुयायी) पीछे चलने वाला, अनुसरण करने वाला। (काज) कार्य, काम। (पतित)
अधम गिरा हुआ। (निर्लेप) अनासक्त। (दुर्गह) बाधा, रूकावट। (तरण) निस्तार, उद्धार।
(नृचक्षस्) मनुष्यों को ठीक से पहचानने वाला। (सुतर) सुख से पार किया जाने वाला।













