हम दिव्य भगवान का वरण करें।

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सखायस्त्वा ववृमहे देवं मास ऊतयें।

अ॒पां नपा॑तं सुभर्ग सुदीर्दितिं सुप्रत॑र्तिमनेहस॑म् ऋ. ३.८.१ साम. ६२

तर्जः पिच्च विच्च नाळ्मुदल कुनी

इत उत मन तू ना विचर
सीख शुभ कर्मों को, सुधर
तू मरण धर्मा है समझ
हर कर्म कर तू सोचकर॥
इत उत…

बन जा सुधी, हो जा गुणी
गुणकर्म स्वभाव से धनी
बन जा साधकों का तू सङ्गी
आचरण में हो धैर्य संयम
मन तू कर प्रभु का वरण
पत्नोन्मुख ना हो रे मन
प्रतिदिन अपना निरीक्षण कर॥
इत उत…

देरे ना धीरे ना, नीधपम रेम रेम, नीध सांनी ध म प ऽ ऽ

ऐश्वर्यों से झोली भर
सबके प्यारे परमेश्वर
अपने कर्मों का तू दे दे वर
चारु चरणों की दे शरण
कर दे शुद्ध मेरे सब करम
जाये ना पापों में ये मन
भवसागर से तारण कर॥

इत उत…