हालत हमारे देश की जिसने ख़राब की।

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शराब की नदियाँ

चार मुक्तक (रुबाईयाँ)

१. हालत हमारे देश की जिसने ख़राब की।
ऐसी ख़राब की है कि बस बेहिसाब की।
बहती थीं ‘पथिक’ दूध की नदियाँ जहाँ कभी
बहनें लगी हैं अब वहाँ नदियाँ शराब की।

२. इनसान को हैवान से बदतर शराब करती है।
न जीता है न मरता है जीवन अज़ाब करती है।
जिसने भी मुँह लगाया है बरबाद हो गया वो
‘पथिक’ यह पीने वालों की मिट्टी ख़राब करती है।

३. यह आग का पानी ‘शराब’ नाम भी बुरा।
पागल करे दिमाग़ को है काम भी बुरा।
इस नामुराद आग के पानी शराब का
आग़ाज़ भी बुरा ‘पथिक’ अंजाम भी बुरा।

४. यह लाल परी किस लिए तुझको पसन्द है।
जो दूर रहे इस से वही अक्लमन्द है।
रहने दे ‘पथिक’ बन्द इस का मुँह न खोलना
तेरी तबाही है जो इस बोतल में बन्द है।