अन्तरिम आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना (29 अक्टूबर 1915)
29 अक्टूबर 1915 को अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर भारत की पहली विदेश स्थित स्वतंत्र सरकार — अन्तरिम आज़ाद हिन्द सरकार — की स्थापना की गई। इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेन्द्रप्रताप बने, प्रधानमंत्री के रूप में हाफ़िज़ मुहम्मद बरकतुल्ला नियुक्त हुए तथा गृहमंत्री का दायित्व मौलाना ओबेदुल्ला सिन्धी को सौंपा गया।‘अन्तरिम’ शब्द का अर्थ यह था कि भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जनता की इच्छा से लोकतांत्रिक ढंग से स्थायी सरकार बनाई जाएगी।
यह केवल कागजी सरकार नहीं थी, बल्कि इसकी अपनी आज़ाद हिन्द फ़ौज भी थी, जिसमें लगभग 6000 सैनिक सम्मिलित थे। इस सेना ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए प्रयास भी किया, किन्तु अंग्रेज़ी सेना की शक्ति के कारण सफलता नहीं मिल सकी।
लिवरपूल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर से क्रान्तिकारी तक–
भोपाल निवासी शेख कुदरतुल्ला के पुत्र बरकतुल्ला उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद इंग्लैंड चले गये। वहाँ लेखन कार्य के साथ उन्हें लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्राध्यापक पद प्राप्त हुआ। यदि वह सामान्य जीवन जीते तो सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत कर सकते थे।किन्तु क्रान्तिकारी चिंतक श्याम जी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का मार्ग चुना। इसी दौरान अफ़ग़ान अमीर हबीबुल्ला खान के छोटे भाई नसरुल्ला खान से उनकी मित्रता हुई, जो आगे चलकर महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।
अमेरिका प्रवास और अंतरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी गतिविधियाँ–
क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेज़ सरकार की निगाह उन पर पड़ गई और उन्हें इंग्लैंड छोड़कर संयुक्त राज्य अमेरिका जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने पैन आर्यन ऐसोसियेशन की स्थापना की और आयरलैंड के क्रान्तिकारियों से सहयोग प्राप्त किया।इसी दौरान उनकी भेंट महान क्रान्तिकारी मादाम भीकाजी कामा से भी हुई, जो यूरोप में भारत की स्वतंत्रता का अभियान चला रही थीं।
टोक्यो विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक–
फरवरी 1909 में वह जापान पहुंचे और टोक्यो विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक बने। उन्होंने ‘इस्लामिक बिरादराना’ नामक पत्रिका निकालकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध उग्र प्रचार आरम्भ किया।अंग्रेज़ी दबाव के कारण जापान सरकार ने उन्हें पद से हटाकर देश छोड़ने का आदेश दे दिया।
ग़दर आन्दोलन और सान फ्रांसिस्को–
23 मई 1914 को वह सान फ्रांसिस्को पहुँचे और क्रान्तिकारी लाला हरदयाल द्वारा स्थापित युगान्तर आश्रम में रहने लगे। यहाँ उन्होंने प्रसिद्ध ग़दर पार्टी की पत्रिका ‘गदर’ का सम्पादन किया।ग़दर आन्दोलन विदेशों में बसे भारतीयों को भारत लौटकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित कर रहा था और बरकतुल्ला इसमें सक्रिय रूप से जुट गये।
बर्लिन समिति और जर्मनी से सहयोग–
1915 में वह जर्मनी पहुँचे जहाँ क्रान्तिकारी वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय तथा अन्य नेताओं के साथ मिलकर बर्लिन समिति का गठन किया गया।इस समिति ने जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय को भारत की सहायता के लिए तैयार कर लिया। जर्मनी ने धन और हथियार देने का वचन भी दिया, जिन्हें बंगाल और पंजाब भेजने की योजना बनाई गई थी।
✦ रूस से सहायता का प्रयास–
अफ़ग़ानिस्तान से निराश होकर राजा महेन्द्रप्रताप और बरकतुल्ला सहायता की आशा में रूस पहुँचे और वहाँ क्रान्तिकारी नेता व्लादिमीर लेनिन से मिले। लेनिन ने सहानुभूति अवश्य व्यक्त की, किन्तु तत्काल सहायता देने की स्थिति में रूस नहीं था।इसके बाद उन्होंने फ्रांस और स्विट्जरलैंड में भी प्रयास किये, पर अंग्रेज़ी दबाव के कारण कहीं स्थायी रूप से कार्य नहीं कर सके।
✦ अंतिम समय और निधन–
लगातार संघर्ष और निर्वासन के कारण उनका स्वास्थ्य अत्यन्त खराब हो गया। अंततः उन्हें पुनः सान फ्रांसिस्को ले जाया गया, जहाँ उपचार के बावजूद 27 सितम्बर 1927 को उनका निधन हो गया।










