विभ्राञ्जयोतिषा स्वष! रगच्छो रोचनं दिवः ।
देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे ॥
ऋ. ७.७८.३ साम. १०२७
तर्जः काटू चिम्बग चोटनिन्न काटी रिन्न पो
चारु चिन्तन, मनस्विन मन, निदिध्यासन दे
मुझे स्वस्ति संयम दे, आनन्दमय कर दे
प्रभु दिव्य दर्शन दे ॥ चारु चिन्तन…
ज्ञान की किरणों से हृदय भर दे
स्वप्रकाश है तू, ज्योतिर्मय कर दे
है आनन्दधन संयमी तू, जिससे तू दाता
पूजता हूँ इसलिए तुझ दाता को
मुझ को तू कर काबिल
मुझे स्वस्ति संयम दे ॥ चारु चिन्तन…
मुझे स्वस्ति संयम दे आनन्दमय कर दे ॥
प्रभु दिव्य दर्शन…
वेद उपदेशक, पूर्ण संयम के
पाया ना आनन्द भोग परायण ने
मनसा वाचा कर्मणा से
पराङ्गमुख रहूँ भोग से
रहूँ उत्तुङ्ग, पालूँ संयम को
रहे शुद्ध चिन्तन
मुझे स्वस्ति संयम दे
आनन्दमय कर दे
चारु चिन्त, मनस्विन मन, निदिध्यासन दे
मुझे स्वस्ति संयम दे आनन्दमय कर दे
प्रभु दिव्य दर्शन दे ॥
आऽऽऽ
चारु सुन्दर,मनमोहक, मनस्विन उच्च विचारवाला, सुधी,निदिध्यासन बारम्बार ईशका ध्यान,
कल्याणकारी, पराङ्गामुख विमुख, निवृत्त, उत्तुत अत्यन्त ऊँचा










