ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः ।
विप्रं मदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्ता ॥
अथर्व. २०.७१.२
तर्ज: गान्द माडुन्या, कार्य मोड्यु, मारवीय मरमो, कम्पोले
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले, ओ भोले !
ज्ञान-कर्म में, यज्ञ घोल ले और उपासना के,
झूल-झूले अध-रिपु क्षारण कर ही ले, पाप तो सुख ना दे
मधुरस आनन्द ले ही ले, सुचरित जीवन जी ले
कल्याण सब का मन में तू चाहे क्यों ना यज्ञ की राह अपनाए
है यज्ञ ही उत्तम, परमात्मा जिसका धाम है।
जो पाप हटाता, यज्ञात्मा निष्काम है।
पल पल नियम, प्रभु पालता, सृष्टि को उसमें ढालता
हितकर मिली, धित धरा, उर्वरा
पाप कुटिलता गाठें लगाए
भावना यज्ञ की सरलता लाए
ऋतज्ञानी बन जा, ऋतगामी सदा महान है
आचार सरलता व्यवहार कुशलता प्राण है
ऋत का मनन सत्याचरण
ज्ञानी-सुधी, करते यजन
तम को हटा, ऐ युवा ! आत्मा !
अङ्गिरा, फिर आत्मा बन जाए
आनन्दधन प्रभु से रस पाएँ
अङ्ग अङ्ग में जिसके परमेश्वर विद्यमान है
मेधावी वही है मधुरस ही जिसका खान है
यज बनो, प्रभु रस चखो
जीवन मिला, सार्थक करो
गाओ ऋचा, पाओ प्रभा, ऐ मना !










