1. प्रारंभिक जीवन
1.1 जन्म और परिवार
- गुरू रामसिंह कूका का जन्म 3 फरवरी 1816 (वसंत पंचमी) को लुधियाना जिले के भैणी ग्राम में हुआ।
- उनके पिता जस्सा सिंह और माता सदा कौर थीं।
- उनके चार भाई-बहन थे, जिनमें वे सबसे बड़े थे।
1.2 विवाह एवं परिवार
- मात्र 7 वर्ष की आयु में उनका विवाह जस्सरी से हुआ।
- उनकी दो पुत्रियाँ थीं – नन्द कौर और दया कौर।
2. सैन्य जीवन और आध्यात्मिकता की ओर रुझान
2.1 सेना में प्रवेश
- 20 वर्ष की आयु में वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भर्ती हुए।
- 1841 में उनकी रेजिमेंट को पेशावर भेजा गया।
2.2 संत बालक सिंह से भेंट
- पेशावर में संत बालक सिंह से उनकी भेंट हुई।
- वे संत बालक सिंह के प्रवचनों से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए।
3. कूका पंथ की स्थापना और समाज सुधार
3.1 सेना से त्यागपत्र और गाँव वापसी
- प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध (1845-46) के बाद उन्होंने सेना छोड़ दी।
- वे अपने गाँव लौटे और खेती, परचूनी की दुकान, ठेकेदारी आदि कार्य करने लगे।
- साथ ही, वे संत बालक सिंह के उपदेशों का प्रचार करने लगे।
3.2 नामधारी पंथ की स्थापना
- उनके प्रवचनों से प्रभावित होकर उनके शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी।
- उनके अनुयायी “नामधारी सिख” कहलाए।
- वे अंग्रेजों के विरुद्ध “कूका” (हुंकार) मारने लगे, जिससे यह आंदोलन “कूका पंथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
3.3 आचार संहिता की घोषणा (14 अप्रैल 1857, वैशाखी)
गुरु रामसिंह ने अपने अनुयायियों के लिए एक आचार संहिता बनाई, जिसमें प्रमुख बिंदु थे:
- गोरक्षा
- स्वदेशी अपनाना
- नारी उद्धार और अंतरजातीय विवाह
- सामूहिक विवाह प्रथा
- मद्यपान निषेध और शाकाहार
- मूर्तिपूजा का विरोध
- सरल और सादा जीवन जीने की प्रेरणा
4. अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष
4.1 स्वदेशी और असहयोग आंदोलन
- उन्होंने अंग्रेजी शासन का बहिष्कार किया।
- स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलाई।
- सरकारी स्कूलों, सेवाओं, और सामानों का विरोध किया।
4.2 कूका आंदोलन और मलेरकोटला घटना
- अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरोध में कूका पंथ के लोग क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हुए।
- 14 जून 1871 – एक कूका अनुयायी पर अत्याचार के कारण कूकाओं ने मुस्लिम बाहुल्य गाँव पर हमला किया।
- 15 जनवरी 1872 – कूकाओं ने मलेरकोटला कोषागार पर हमला किया।
- इस संघर्ष में 1 अंग्रेज अधिकारी और 8 पुलिसकर्मी मारे गए।
4.3 कूका नरसंहार (17-18 जनवरी 1872)
- संघर्ष में 68 कूका अनुयायी गिरफ्तार किए गए।
- 17 जनवरी 1872 – 50 कूकाओं को तोप के सामने खड़ा कर उड़ा दिया गया।
- 18 जनवरी 1872 – शेष 18 को फांसी दे दी गई।
5. गुरु रामसिंह की गिरफ्तारी और निर्वासन
- 18 जनवरी 1872 – गुरु रामसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
- उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) के मांडले जेल में भेज दिया गया।
- वे 14 वर्षों तक कठोर यातनाएँ सहते रहे।
- 29 नवंबर 1885 – उन्होंने मांडले जेल में अपने प्राण त्याग दिए।
6. विरासत और योगदान
- गुरु रामसिंह कूका का आंदोलन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का प्रेरणा स्रोत बना।
- उन्होंने गोरक्षा, स्वदेशी और सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया।
- उनके अनुयायी आज भी नामधारी सिख पंथ के रूप में जीवित हैं।
- भारत की स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अमर है।
7. निष्कर्ष
गुरु रामसिंह कूका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम क्रांतिकारियों में से एक थे।
उन्होंने धर्म, समाज सुधार और राष्ट्रभक्ति को एक नया आयाम दिया।
उनकी बलिदान गाथा सदैव प्रेरणा देती रहेगी।
विस्तृत जीवन परिचय
गुरू रामसिंह कूका भारत की आजादी के सर्वप्रथम प्रणेताओं में से एक (कूका विद्रोह), असहयोग आंदोलन के मुखिया, सिखों के नामधारी पंथ के संस्थापक, तथा महान समाज-सुधारक थे। उनका जन्म 3 फरवरी 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में जस्सा सिंह और सदा कौर के यहाँ हुआ था। अपने 4 भाई बहनों में सबसे बड़े रामसिंह का 7 वर्ष की आयु में ही जस्सरी के साथ विवाह हो गया इससे इन्हें दो बेटियां हुयीं, नन्द कौर और दया कौर। 20 वर्ष की आयु में वे महाराज रणजीत सिंह की सेना शामिल हो गए। 1841 में उनकी रेजिमेंट को पेशावर में ठिकाना बनाने का हुक्म दिया और यहीं पेशावर में उनकी मुलाकात सिख पंथ के गुरु साहिबान की शिक्षाओं के आधार पर उपदेश करने वाले संत पुरुष बाबा बालक सिंह से हुयी और उनसे प्रभावित होकर रामसिंह उनके शिष्य बन गए। प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध की समाप्ति के बाद रामसिंह ने सेना से त्यागपत्र दे दिया और वे अपने गाँव लौट आये। घर आकर जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने खेतीबाड़ी, परचूनी की दूकान एवं ठेकेदारी के काम किये पर साथ ही साथ में अपने गुरु बाबा बालक सिंह जी के उपदेशों का प्रचार भी करते रहे। इनकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे और धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो नामधारी कहलाया। थोड़े समय में ही लाखों लोग नामधारी सिख बन गए, जो निर्भय, निशंक होकर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कूके (हुंकार) मारने लगे और इसीलिए इतिहास में कूका पंथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। 14 अप्रैल 1857 को वैशाखी के दिन रामसिंह जी ने अपने अनुयायियों के लिए एक आचार संहिता की घोषणा की। इसमें गुरू रामसिंह ने गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह, मद्य निषेध , शाकाहार , मूर्ती पूजा का विरोध, सादा जीवन शैली आदि पर विशेष जोर दिया। धीरे धीरे रामसिंह और उनके पंथ का प्रभाव इतना बढ़ गया कि उन्होंने अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी, सरकारी सामानों, सेवाओं, स्कूलों आदि का विरोध किया, स्वदेशी पर जोर दिया और अंग्रेजी सरकार की अवहेलना करना शुरू कर दिया। राष्ट्रीय भावना और धार्मिक भावना से ओत प्रोत कूका धीरे धीरे अंग्रेजी सरकार की नाक में दम करने लगे, जिससे 1857 की क्रान्ति झेल चुकी सरकार चौकन्नी हो गयी और उसने कूका पंथ की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू किया और बाबा रामसिंह के क्रियाकलापों पर प्रतिबन्ध लगाने लगी। इसी बीच प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में लगने वाले मेले में एक घटना घट गयी। मेले में आते समय उनके एक शिष्य को कुछ धर्मांध मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये और उन्होंने 14 जून 1871 के दिन उस गांव पर हमला बोल दिया। इसमें कुछ लोग मारे गए और कुछ घायल हो गए। इसी तरह की कुछ और घटनाएँ दुसरे स्थानों पर भी हुयी जिससे सतर्क अंग्रेज सरकार ने कूकाओं के विरुद्ध कार्यवाही करना आरम्भ कर दिया। परन्तु कूका इससे डरे बिना बेख़ौफ़ सरकार को ही चुनौती देने लगे, जिसके बाद सरकार ने कूकाओं के एकत्रित होने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। पर कूका इतने अधिक आक्रोश और उत्साह में थे कि उन्हें रोकना असंभव हो गया। 15 जनवरी 1872 को करीब 100 कूका मलेरकोटला पहुंचे और उन्होंने कोषागार पर हमला कर दिया जिसमे 1 अंग्रेज अधिकारी और 8 पुलिस वाले मारे गए। कुछ और कूका भी वहां पहुंचे पर दूसरी तरफ से अंग्रेज सेना आ गयी, अत: युध्द का पासा पलट गया। इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को 17 जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया और वे उसी स्थान पर रखे गए जहाँ अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र को रखा गया था। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 29 नवम्बर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया, परन्तु अपने अनुयायियों के हृदयों में वे सदैव जीवित रहेंगे। उनके द्वारा अपनाया गया बहिष्कार और असहयोग का मार्ग ही आगे चलकर भारत को स्वतंत्रता दिलवाने का प्रमुख अस्त्र बना।
~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी
कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि!










