गिरते-गिरते गिर गये और गिरते जा रहे।
गिरते-गिरते गिर गये,
और गिरते जा रहे।
पहले सब कुछ, और फिर कुछ,
आज कुछ भी ना रहे।।
विश्व का नेता, प्रणेता,
प्यारा भारत वर्ष था।
थे सुखी समृद्ध सारे,
प्राणियों में हर्ष था।
पथ से गिरके, फिरके-फिरके,
फिरकों में भटका रहे।।1।।
विश्व हिस्सों में बंटा जिन
भूलों के परिणाम से।
आज भी नफरत नहीं,
उन गल्तियों के नाम से।।
ठोकरों पर ठोकरें,
खा-खा के ठोकर खा रहे।।2।।
हो गया नैतिक पतन,
फिर भी नशे में चूर हैं।
जिन्दा तो है आज हम,
पर जिन्दगी से दूर हैं।।
यह दिखावट यह बनावट
करके ना शरमा रहे।।3।।
प्रातः का खोया हुआ
जो शाम को लौट आये
घर खोये जाने वालो में है,
प्रेमी वह बेहतर बशर ।।
भूले भटके, घर पलट के
आज भी नहीं आ रहे।।4।।










