गयौ उजड़ि लखीना बाग काटि गये

0
31

गयौ उजड़ि लखीना बाग काटि गये

गयौ उजड़ि लखीना बाग काटि गये
हरे-हरे काटि गये
खुदमाली स्वर्ग समान
देश था अपना, दुनियाँ में मशहूर।
फल-फूलों से लदा हुआ था,
बिल्कुल था भरपूर ।।
झुकी थी डाली-डाली ।। गयौ० ।।

सतयुग में हरीश्चन्द्र माली ने धर्म
के पौधे लगा लगाकर बहे थी
खूब करी रखवाली।
सींची डाली-डाली ।।
दूधों की नाली ।। गयौ० ।।

त्रेता में श्री रामचन्द्र ने किया
बड़ा उपकार।
धर्म बाग की रक्षा के हित,
झेले कष्ट अपार ।।
छाई थी यहाँ पै हरियाली ।। गयौ० ।।

द्वापर में दुर्योधन माली
मेवा बो गया फूट।
प्रेम के पौधे काट-काट कर,
कर गया टूठम ठूठ ।।
गई थी यहाँ से हरियाली ।। गयौ० ।।

फिर ठूंठों से पत्ते निकले,
छाई कुछ हरियाली।
जयचन्द माली ने आकर
की बिलकुल ही पामाली ।।
छायी यहाँ घटा काली ।। गयौ०

काली घटा देखकर आये
दयानन्द ऋषिराज ।
वेद मन्त्र के वाणों से सखि !
फेरि सुधारे काज ।।

छाई फिर उजियाली ।। गयौ०