“गाई है वेदों ने महिमा वाणी जो सुहाती”

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सावधानता से बोलें
वाणी हमारी होवे अकरा
ऐसी वाणी बोलें ना
जिसमें आभासित होवे अज्ञता
प्रशस्या वाणी-कथनों में
छलकती रहे मिठास अनुपमा
सत्य बोलें प्रिय बोलें
सत्य अप्रिय ना हो अनचहा
ध्यान में रहे निरन्तर वाणी की थाति
गाई है वेदों ने महिमा
वाणी जो सुहाती

प्राणियों का उपकार
वाणी के द्वारा करते रहें
कष्ट, पीड़ा ध्यान में धरकर
सत्कार सेवा करते रहें
हिंसा को त्याग देवें
अहिंसा का रंग भरते रहें
अपने-परायों का
हित-कल्याण साधते रहें
जले कान्ति युक्त
ज्ञानप्रकाश की बाती
गाई है वेदों ने महिमा
वाणी जो सुहाती

इसलिए प्यारे साधक !
गण्या तू वाणी अपनी बना
मीठे बोलों से हर प्राणी के
मन में प्रेम जगा
अहिंसक प्रभु का शासन
जान-मान के तू खुद को चला
विनम्र अहिंसक बनकर
वाणी के ओज-तेज को बढ़ा
माथे लगा ले गर्वित देश की माटी
गाई है वेदों ने महिमा
वाणी जो सुहाती
गाई है वेदों ने महिमा
वाणी जो सुहाती
वाणी हो अति सुखकारी
और मृदु मधमाती

संसार में कुछ मनुष्य ऐसे हैं कि सारा सारा दिन चिल्लाया करते हैं, किन्तु उनकी बात की और कोई भी ध्यान नहीं देता। दूसरे वे हैं जिनकी बात सुनने को संसार सदा लालायित रहता है, उत्सुक रहता है। उनके एक-एक वचन को सावधानता से और और ध्यान से सुनना चाहता है और गंभीरता पूर्वक उसकी गहराई तक पहुंचने का यत्न किया जाता है। सचमुच ऐसों की वाणी ही वाणी है। तभी वेद कहता है:-
इळा येषां गण्या माहिना गी:–जिनकी वाणी महत्व के कारण गण्या तथा प्रशस्याहै। वे सदा सावधान रहते हैं कि उनकी वाणी से किसी को हानि ना हो। वे सत्य तो बोलते हैं और सत्य ही बोलते हैं किन्तु उनका सिद्धांत है कि:-सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूमान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्[मनु•४/१३८]
सत्य बोलें प्रिय बोलें किन्तु अप्रिय सत्य कभी ना बोलें। उन्हें ज्ञात है, तलवार का घाव ठीक हो जाता है, किन्तु वाणी का घाव नहीं भरता है।
यह वाणी सब प्राणियों के उपकार के लिए प्रयुक्त की जाती है ना कि प्राणियों की पीड़ा के लिए और यदि यह इस भान्ति कहीं जाकर प्राणियों की पीड़ा का कारण हो तो वह सत्य नहीं है, पाप ही है अर्थात् सत्य बोलने का प्रयोजन प्राणियों का हित है। यदि वह सिद्ध नहीं होता तो मौत का अवलंबन करना चाहिए। परापकार अथवा पराए अनिष्ट से उच्चारण किए वचनों का परिणाम बोलने वाले को भी कभी न कभी भोगना ही पड़ता है, अतः बोलने से पूर्व तोलना चाहिए। सत्यवादिता के अहंकार में पापोच्चारण हो जाया करता है। इसका सदा ध्यान रखना चाहिए। इनकी वाणी के महत्व का कारण है क्योंकि वे सुखवर्षक अहिंसक भाव के आनन्द को जानते हैं। सचमुच अहिंसा में जो रस है, आनन्द है, वह हिंसा में कहां? हिंसक को सदा प्रतिहिंसा का भय सताता रहता है। वे महान भगवान के शासन में आज्ञा-पालन में आनन्द मनाते हैं। भगवान के उपदेश तथा सृष्टि- नियमके अनुकूल चलकर वे अपना तथा पराया कल्याण साधते हैं और इसी कारण ज्ञानप्रकाश से उत्तम कान्तियुक्त होकर देदीप्यमान रहते हैं। अहिंसा की दीप्ति और तेज अवरनीय होते हैं। पशु तक उनके प्रभाव में आकर वैर छोड़ देते हैं। प्रेम की=अहिंसा की महिमा ही ऐसी है। इसलिए वेद में मीठा बोलने का बार-बार विधान है। –‘वाचं दुष्टा मधुमतीमवादिषम्’
अथर्ववेद ५/७/४।।
मैं प्रीतियुक्त मीठी वाणी बोलता हूं।

अतः साधक! तू भी अपनी वाणी को गण्या बना। मीठे बोल से लोगों को अपना बना। उसके लिए वेदोक्त प्रेमपथ= अहिंसक मार्ग को अपना और उससे पूर्व अहिंसक भगवान के शासन में चलना अपने आप को सिखा। नम्र और अहिंसक बनकर तेरा ओज और तेज घटेगा नहीं, बढ़ेगा ही। वह तेरा आज सर्वाभिभावी होता हुआ भी जनमनहारी होगा |