द्वेष से दूर

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त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः ।

यजिष्ठो वहितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाँसि प्रमुमुग्ध्यस्मत्॥

. ४.१.४ यजु. २१/३

तर्जः प्रेमा ने पंख दिले प्रेम पांखरा

अपमान देवों का करना है बुरा।
उनके नियमों की न कर अपूजा॥
॥उनके ॥

छुटकारा पाना है दुःख से आखिर
जानबूझ पाप बन्धन में ना तू गिर
राग द्वेष का मानव, रहे अधूरा ॥ (2)
॥उनके ॥

देव प्रकृति के या फिर मनुष्य
हैं शिव नियम से आवृत करते सुकृत्य
होती है देवों में गहन-गूढ़ता। (2)
॥उनके ॥

धर्म-मर्यादा का ना कर उल्लंघन
पाये न जिससे दुःख-व्याधि-बन्धन
पापघ्न वरुण कर दया कर कृपा (2)
॥उनके ॥

वरुण तेरे क्रोध के ना बने भाजन
यजनीय कर्मों का करते रहे पालन
कौन तुझसे बढ़के है याज्ञिक बड़ा?(2)
॥उनके ॥

हे दयालु यज्ञ भाव हममें भी भर दो
और राग द्वेष रहित सुभाव कर दो
प्रेम से परिपूर्ण कर दो जिया॥ (2)
॥उनके ॥

पा के तुझसे शक्ति तर गये अनेकों
श्रेष्ठ गुण वाहक शुभगुण हमें दो
द्वेष रहित कर दो अग्ने, त्वरा ॥
॥उनके ॥

हे अग्ने! हे वरुण! हे शोशुचान !
देश क्रोध हिंसा का कर दो निदान
जाज्वल्य तेज से राख हो अपा॥

(अपूजा) सेवा न करना। (गहन गूढ़ता) गहरे छिपे भाव। (आवृत्त) घिरा हुआ, व्यापक।
(पापघ्न) पापों से मारने वाला। (जिया) हृदय। (निदान) अन्त। (सुकृत्य) शुभकार्य ।
(भाजन) पात्र। (त्वरा) तुरन्त, शीघ्र (अपा) घमंड। (शोशुचान) अत्यंत प्रदीप्त। (जाज्वल्य)
धधकता हुआ।